پژوهش
و گردآوری از بانو رویا.غ , برداشت این نوشتار با ذکر نام و آدرس پایگاه آزاد است
تنها بازمانده يك كشتی شكسته توسط جريان آب به يك جزيره دورافتاده برده شد، او با بيقراری به درگاه خداوند دعا میكرد
تا او را نجات بخشد، او ساعتها به اقيانوس چشم میدوخت، تا شايد نشانی از كمك بيابد اما هيچ چيز به چشم نمیآمد.
سرآخر نااميد شد و تصميم گرفت كه كلبه ای كوچك خارج از كلك بسازد تا از خود و وسايل اندكش را بهتر محافظت نمايد، روزی پس از آنكه از جستجوی غذا بازگشت، خانه كوچكش را در آتش يافت، دود به آسمان رفته بود، بدترين چيز ممكن رخ داده بود، او عصباني و اندوهگين فرياد زد: «خدايا چگونه توانستی با من چنين كنی؟»![]()
صبح روز بعد او با صدای يك كشتی كه به جزيره نزديك میشد از خواب برخاست، آن میآمد تا او را نجات دهد.
مرد از نجات دهندگانش پرسيد: «چطور متوجه شديد كه من اينجا هستم؟»![]()
آنها در جواب گفتند: «ما علامت دودی را که فرستادی، ديديم!»![]()
آسان میتوان دلسرد شد هنگامی كه بنظر میرسد كارها به خوبی پيش نمیروند، اما نبايد اميدمان را از دست دهيم زيرا خدا در كار زندگی ماست، حتی در ميان درد و رنج.
دفعه آينده كه كلبه شما در حال سوختن است به ياد آورید كه آن شايد علامتی باشد برای فراخواندن رحمت خداوند.
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آبگينه |
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نام يک شاهزاده ايراني |
آتوسا |
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آتش، نهمين ماه ايراني |
آذر |
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نام پسر مهرنوش پسر اسفنديار |
آذرافروز |
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صاعقه، نام روز نهم از ماه آذر |
آذرخش |
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نام گلي است برنگ سرخ |
آذرگون |
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پاکدين |
آذرنوش |
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آرا | |
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آرزو |
آرزو |
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آزاد، رها |
آزاده |
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نام يک شاهزاده ايراني |
آزيتا |
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زينت آلات |
آزين |
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مانند |
آسا |
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تشويق |
آفرين |
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نام گلي |
آلاله |
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الهه آب |
آناهيتا |
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صدا |
آوا |
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آويز |
آويزه |
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آهو |
آهو |
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ستاره، نام گلي |
اختر |
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سياره ارانوس |
ارانوس |
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نام درختي که گل و شکوفه سرخ رنگ مي دهد |
ارغوان |
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رنگ ارغواني روشن، نام گلي |
ارکيده |
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هديه |
ارمغان |
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تاج |
افسار |
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افسانه |
افسانه |
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طلسم و جادو |
افسون |
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پاشيدن |
افشان |
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الناز | |
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خوشبخت |
انوشه |
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نام کشور ايران |
ايران |
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دختر ايران |
ايران دخت |
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خانم، متشخص، زن مجرد |
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کريستال |
بلور |
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گل بنفشه |
بنفشه |
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دختر و دوشيزه هدهد، نام مرغ حضرت سليمان |
بوبک |
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بوس، بوسيدن |
بوسه |
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فصل بهار |
بهار |
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بهار کوچک |
بهارک |
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آورنده بهار |
بهاره |
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بهترين ناز |
بهناز |
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بهترين صورت |
بهرخ |
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منحصر بفرد |
بيتا |
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پديده، چيز جديد |
پديده |
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اسم يک پرنده |
پرستو |
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ابريشم |
پرند |
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پري |
پري |
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داراي صورتي همچون پري |
پري رو |
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جمع پري |
پريا |
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داراي صورتي همچون پري |
پريچهر |
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زاده پري |
پريزاد |
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مانند پري |
پريسا |
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داراي صورتي همچون پري |
پريوش |
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پرتو |
پرتو |
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پروانه |
پروانه |
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نام يک صور فلکي |
پروين |
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سپيده دم |
پگاه |
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نوعي پرنده |
پوپک |
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موفق |
پوران |
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يکي از شخصيت هاي شاهنامه |
پوران دخت |
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موفق |
پوري |
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نام گلي |
پونه |
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جام شراب |
پيمانه |
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ارتباط |
پيوند |
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ستاره |
تارا |
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آهنگ، نغمه |
ترانه |
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مسيحي |
ترسا |
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نام کشور دشمن ايران در شاهنامه |
توران |
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نوعي پرنده |
توکا |
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يکي از شخصيتهاي شاهنامه |
تهمينه |
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سفال |
تينا |
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نام يک صور فلکي |
ثريا |
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جوان، گل جوانه |
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چليپا | |
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ياد، يادگاري |
خاطره |
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خندان |
خندان |
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خجسته | |
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آفتاب |
خورشيد |
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ستاره اي درخشان که مانند گوهر مي درخشد |
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آرام دل |
دلارام |
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مليح، خوش قلب |
دلبر |
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جذاب |
دلکش |
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دريا |
دريا |
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جهان |
دنيا |
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آرامش |
رامش |
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پرمعني |
رسا |
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روشنايي |
رکسانه |
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روح، روان |
روان |
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يک از شخصيت هاي شاهنامه، مادر رستم |
رودابه |
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نور کوچک |
روشنک |
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آزاد |
رها |
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ريما | |
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حرير، زربافت |
زري |
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طلايي |
زرين |
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دختر طلايي |
زرين دخت |
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زويا | |
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سياره زهره(ونوس)ر |
زهره |
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زيبا، قشنگ |
زيبا |
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شبنم |
ژاله |
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ژيلا | |
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جام شراب |
ساغر |
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سالومه | |
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نام گلي |
ساناز |
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سايه |
سايه |
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نور اول صبح |
سپيده |
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ستاره |
ستاره |
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زن زيبا، درخت سروناز |
سروناز |
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ياسمن |
سمن |
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سميلا | |
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سميرا | |
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سنا | |
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يکي از شخصيت هاي شاهنامه |
سودابه |
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رز قرمز |
سوري |
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شعله ور، درحال سوختن |
سوزان |
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نام گلي |
سوسن |
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قسم خوردن |
سوگند |
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سپتا | |
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صورت، رخ |
سيما |
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نقره اي |
سيمين |
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شاد |
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شادي، خوشحالي |
شادي |
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سلطنتي |
شاهين |
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شبنم(ژاله)ر |
شبنم |
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جرقه |
شراره |
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شروين | |
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شعله، آتش |
شعله |
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شکوفه |
شکوفه |
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جلال، زرق و برق |
شکوه |
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نوعي آهو |
شوکا |
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بانوي شهر |
شهربانو |
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زاده شهر |
شهرزاد |
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عشق شهر |
شهرناز |
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شاهزاده |
شهزاده |
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زن سياه چشم |
شهلا |
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عشق شاه |
شهناز |
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شيدا | |
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آفتاب، درخشان |
شيده |
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ظريف، شيرين |
شيرين |
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زن شيرين و حساس |
شيرين بانو |
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افسون شده |
شيفته |
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شيما | |
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فريبا |
شيوا |
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شراب |
صهبا |
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پاک، خالص |
طاهره |
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طلا |
طلا |
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عسل |
عسل |
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آهوي کوهي |
غزال |
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آهوي کوهي |
غزاله |
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طنازي |
غمزه |
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غنچه گل |
غنچه |
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يکي از شخصيتهاي شاهنامه |
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خوشي |
فرحناز |
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شاد |
فرخنده |
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عاقل |
فرزانه |
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فرشته، پري |
فرشته |
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عشوه گر |
فرناز |
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يکي از شخصيت هاي شاهنامه |
فرنگيس |
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درخشان |
فروزان |
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درخشان |
فروزنده |
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روشني |
فروغ |
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مليح |
فريبا |
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پرارزش |
فريده |
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ستوده |
فرين |
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فيروزه |
فيروزه |
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عاشق |
فيلا |
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گل قاصدک |
قاصدک |
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مقدس، فرشته |
قدسي |
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يکي از شخصيت هاي شاهنامه |
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ماده اي که مس را به طلا تبديل مي کند |
کيميا |
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يکي از شخصيت هاي شاهنامه |
گردآفريد |
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يکي از شخصيت هاي شاهنامه |
گرديا |
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چشمان |
گلاره |
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گلبانو | |
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گل فصل بهار |
گلبهار |
| گلپري | |
| باغ گل | گلشن |
| گل انار، به زيبايي گل | گلنار |
| گلنسا | |
| رنگ قرمز گل رز | گلي |
| نوعي آهنگ | گيتا |
| جهان، دنيا | گيتي |
| گيسو | |
| نام گلي | لادن |
| گل لاله | لاله |
| ليدا | |
| شبانه | ليلا |
| نام گلي | ليلي |
| مانند | مانا |
| نام يک شاهزاده | ماندانا |
| نقاشي که خود را پيامبر معرفي کرد | ماني |
| وجوه ماه | ماهدخت |
| کسي که صورتش مانند ماه باشد | ماهرخ |
| مرجان | مرجان |
| مرجان | مرجانه |
| مرمر | مرمر |
| ملکه | ملکه |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | منيژه |
| مرواريد | مرواريد |
| گل مريم | مريم |
| خبر خوش | مژده |
| مژه ها | مژگان |
| مست | مستانه |
| ميشا | |
| نام يک الهه | مونا |
| مثال ماه | مهتا |
| مثال ماه | مهتاب |
| مهر انگيز | مهر انگيز |
| نور آفتاب | مهرناز |
| مهرنوش | |
| خورشيد، مهربان | مهري |
| ماه، مهتاب | مهسا |
| درخت گل ياس | مهستي |
| مهشيد | |
| نور ماه، شکوه ماه | مهناز |
| مهنوش | |
| مثال ماه، زيبايي | مهوش |
| دختر ماه | مهين |
| نام يک الهه | ميترا |
| مينا | مينا |
| مينو | |
| شوق آفرين | نازآفرين |
| گل زيبا | نازگل |
| خوش قلب | نازنين |
| زيبا | نازي |
| زيبا | نازيلا |
| نام يک درخت | ناژين |
| ونوس، ستاره زهره | ناهيد |
| صدا | ندا |
| نام گلي | نرگس |
| نام گلي | نسترن |
| رز وحشي | نسرين |
| ترانه، آهنگ | نغمه |
| خوش قلب | نگار |
| نگاه | نگاه |
| سنگ روي انگشتر و جواهرات | نگين |
| نوا | نوا |
| شادي خلق | نوش آفرين |
| شيرين | نوشين |
| نهال | نهال |
| خوب، زيبا | نيکو |
| خوبي | نيکي |
| نام گلي(زنبق آبي)ر | نيلوفر |
| شنونده | نيوشا |
| آرزو | وندا |
| آشکار | ويدا |
| هديه | هديه |
| وجود | هستي |
| پرنده اي افسانه اي | هما |
| حيرت انگيز | هنگامه |
| گل ياس | ياس |
| گل ياس | ياسمن |
| تنها، يگانه | يکتا |
| تنها، يگانه | يگانه |
| نام بلندترين شب سال | يلدا |
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يکي از شخـصيت هاي شاهـنامه، پدر فريدون |
آبـتين |
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آتـش |
آتـش |
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نام فرمانده لشگر بابک خـرمدين، تـزيـين و آرايش |
آذين |
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نام فرشته اي |
آراد |
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ساکت |
آرام |
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نام پدر زن داريوش کبـير |
آرتان |
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يکي از پهـلوانان سنـتي ايران |
آرش |
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بسيار نيرومند، پدر بزرگ داريوش کبـير |
آرشام |
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هـدف |
آرمان |
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يکي از شخـصيت هاي شاهـنامه |
آرمين |
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نام باستاني ايران |
آريا |
| داراي خلق و خوي آريايي، نام پسر داريوش | آريامنش |
| منسوب به نژاد و قوم آرين يا آريايي | آريانا |
| مربوط به نژاد آريا | آرين |
| آزاد | آزاد |
| خاص و خالص، پاک و پاکيزه | آويژه |
| پاره آتش | اخـگر |
| يکي از شخـصيتهاي شاهـنامه | اردشير |
| اردلان | |
| يکي از شخـصيت هاي شاهـنامه | اردوان |
| يکي از شخـصيت هاي شاهـنامه | ارژنگ |
| شير | ارسلان |
| سرير و تخـت |
ارشيا |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | اسفنديار |
| بنيانگذار سلسله اشکانيان | اشکان |
| شريک، معاون، رفيق | افشار |
| نام سردار ايراني | افشين |
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آرزو |
اميد |
| شاه | امير |
| جاودان | انوش |
| نام يکي از پادشاهان ايراني در زمان ساسانيان | انوشيروان |
| ادراک | اورنگ |
| نام يکي از شخصيتهاي شاهنامه | ايرج |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | بابک |
| نام نوازنده نامي دربار خسرو پرويز | باربد |
| آغاز صبح | بامداد |
| نام نوازنده نامي دوران ساسانيان | بامشاد |
| بامين | |
| نام يک شاهزاده(برادر کمبودجيه پسر کوروش)ر | برديا |
| يکي از سرداران يزدگرد ساساني | برسام |
| جوان | برنا |
| بلند بالا، نام پسر سهراب | بروز |
| نام پهلوان ايراني، نام پسر گرشاسب | برزن |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | بزرگمهر |
| به دين | به آئين |
| نگهبان | بهبد |
| بهراد | |
| مريخ، يکي از شخصيتهاي شاهنامه | بهرام |
| رنگ نيک | بهرنگ |
| روز خوب و نيک | بهروز |
| کسي که به نيکي زاده شده | بهزاد |
| يازدهمين ماه ايراني، نام يکي از شخصيت هاي شاهنامه | بهمن |
| داراي مش و کردار شايسته | بهمنش |
| مشهور | بهنام |
| نام شاهان هند | بهنود |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | بيژن |
| ايراني، مقدس | پارسا |
| نامي آذري به معناي پروردگار | پاشا |
| رزمجو | پرشان |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | پرويز |
| نام يک پيامبر | پرهام |
| پژمان | |
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پوريا |
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جستجو، جويا |
پويا |
| آرزو | پوژمان |
| نام يکي از پهلوانان ايراني در زمان کيقباد | پولاد |
| آهنگساز دوران خسرو پرويز ساساني | پهلبد |
| پيام | پيام |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | پيروز |
| نام برادر شاپور اول | پيروزان |
| قبول | پيمان |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | تورج |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | تهماسب |
| نام يکي از شاهان ايراني | تهمورث |
| تيرداد | |
| تيمور | |
| ابدي | جاويد |
| نام شاهي باستاني، يکي از شخصيت هاي شاهنامه | جمشيد |
| دارنده جهان | جهاندار |
| شاه جهان | جهانشاه |
| فاتح جهان | جهانگير |
| مدافع | حامي |
| هديه اي از طرف خدا | خداداد |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | خسرو |
| نام يکي از شاهان هخامنشي | خشايار |
| داديه | |
| ثروتمند، يکي از شخصيتهاي شاهنامه | دارا |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | داراب |
| نام يکي از شاهان هخامنشي | داريوش |
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دانوش |
| رامبد | |
| رامين | |
| نوازنده معروف زمان ساسانيان | رامتين |
| درخشان | رخشان |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | رستان |
| روزبه | |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه ( پدر رستم )ر | زال |
| زامياد | |
| نام يک پيامبر | زرتشت |
| زند | |
| بنيانگذار عهد ساساني | ساسان |
| رهبر | سالار |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | سام |
| خانه، سامان | سامان |
| بالا مقام | سامي |
| آسمان | سپهر |
| سروش | |
| شاهزاده | سنجر |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه ( فرزند رستم )ر | سهراب |
| مرد سياه مو | سيامک |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | سياوش |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | شاپور |
| صورت شاه | شاهرخ |
| خواست شاه | شاهکام |
| باز ( پرنده اي کوچکتر از عقاب )ر | شاهين |
| سزاوار | شايا |
| سزاوار | شايان |
| شروين | |
| ستاره دنباله دار | شهاب |
| شاهين دربار | شهباز |
| نام پادشاهي | شهرام |
| هديه شهر | شهرداد |
| رودي بزرگ | شهروز |
| شاه | شهريار |
| دوست شاه | شهيار |
| اعتماد | عماد |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | فرامرز |
| راست | فربد |
| عالي | فرجاد |
| شاد | فرخ |
| شاد به دنيا آمده | فرخزاد |
| فرداد | |
| بهشت | فردوس |
| فردين | |
| تولد باشکوه | فرزاد |
| سزاوار | فرزام |
| عاقل | فرزان |
| دانا | فرزين |
| شاد | فرشاد |
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فرشيد |
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بالا |
فرناز |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | فرود |
| جوهر | فروهر |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | فرهاد |
| فرهنگ | فرهنگ |
| فرهود | |
| يکي از شحصيت هاي شاهنامه | فريبرز |
| منحصر بفرد | فريد |
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يکي از شخصيت هاي شاهنامه |
فريدون |
| پيروز، پيروزي | فيروز |
| موفق | کامران |
| آرزوي شاد | کامشاد |
| موفق | کاميار |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | کسرا |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | کاوه |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | کاووس |
| کورس | |
| بنيانگذار سلسله هخامنشي در ايران | کورش |
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کوشنده، سخت کوش |
کوشا |
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شاه، مدافع، محافظ |
کيا |
| شاهان | کيان |
| کيارش | |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | کيانوش |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | کيخسرو |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | کيقباد |
| جهان | کيوان |
| يکي از شخصيت هاي شاهنامه | کيومرث |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | گباد |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | گشتاسب |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | گودرز |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | گيو |
| مازيار | |
| ماکان | |
| نقاشي که خود را پيامبر معرفي مي کرد | ماني |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | منوچهر |
| مهبد | |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | مهراب |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | مهران |
| هديه آفتاب | مهرداد |
| نوزاد آفتاب | مهرزاد |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | مهرک |
| رنگ آفتاب | مهرنگ |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | مهيار |
| تولد | ميلاد |
| مشهور | نامدار |
| مشهور | نامور |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | نريمان |
| روشنايي | نوري |
| بشادي زائيده شده | نوشزاد |
| خبر خوش | نويد |
| کوچک | نميا |
| شنونده | نيوشا |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | هرمز |
| هوتن | |
| دانا | هوشمند |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | هوشنگ |
| دانا | هوشيار |
| يکي از شخصيتهاي شاهنامه | هومان |
| نيک انديش | هومن |
| ورشاسب | |
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نامي آذري - بمعني جاويد |
ياشار |
دمي با حکیم فرزانه , عمر خیام نیشابوری , فيلسوف بزرگ مشرق زمین
هر روز که آفتاب بر می آید یک روز ز عمر ما بسر می آید
هر صبح که نقد عمر ما میدزدد دزدیست که با مشعل در می آید
روزگار دهشتناک خیام فیلسوف
خیام بدون تردید یکی از دانشمندان , فیلسوفان و ستاره شناسان بزرگ ایران و جهان است که جهان امروز پس از حدود 900 سال هنوز از بزرگی او سخنهای بسیاری گفته است و نامش در تمامی کشورهای جهان شنیده می شود . وی همدوره نظام الملک و حسن صباح بود . او در ریاضیات نجوم و فلسفه از همه روزگار خود بالاتر بود . همروزگاران وی , اور را امام , حجه الحق , فیلسوف عالم , سید الحکما المشرق و المغرب , دستور و . . . نامیده بودند . متاسفانه برخی افراد که با عقاید بزرگ وی مشکل دارند وی را با لقب شاعر خطاب میکنند . در حالیکه رباعیات وی آخرین برگ زرین ( ریاضیات - نجوم - فلسفه - عرفان و . . . ) زندگی اش است و اینکه وی برای بکار بردن اندیشه و فلسفه نیک زندگی کردن از رباعیات شیرین و زیبای خود بهره برده است . علم ریاضیات و نجوم وی زبان زد روزگار بوده است و نامیدن وی با لقب شاعر نشان از کوته نگری برخی از ما ایرانیان دارد . او زمانی لب بر سخن گشود که بزرگان اسلامی جرات سخن گفتن نداشتند و افراد برجسته اسلامی مانند : شهاب الدین سهروردی و عین القضاه همدانی برای ابراز عقیده خود که تنها کمی با عقاید مسلمانان مقدس نما متفاوت بوده است تکه تکه میشوند و یا به آتش کشیده میشدند . حتی امام محمد غزالی نیز همزمان با خیام بود که او نیز از متعصبین اسلامی به حساب می آید و کتابهای مفیدی در ستایش قوانین اسلامی نگاشته است . با اینحال چندین بار کتابهای امام محمد غزالی در بلاد غرب بدلیل کفر به اسلام به آتش کشیده میشود و وی را کافر مینامند . امام غزالی بر این باور بود که اگر شخصی یهودی بوده است تنها به این دلیل است که در خانواده ای یهودی به دنیا آمده است و اگر کسی مسلمان است به همین دلیل است . پس دین او ارزشی ندارد . پس زمانی دین او ارزش پیدا میکند که او عقاید خانواده و آموزش های آنان را بدور اندازد و خود شخصا برای انتخاب دین نیک تلاش کند . برای بیان این سخنان منطقی او را کافر نامیدند . یک قرن پیش از خیام منصور حلاج که مسلمان بود به دار آویخته شد و بدنش تکه تکه گردید . قبل از وی بابک خرمدین سردار بزرگ ایرانی توسط مسلمانان و خلیفه عباسی تکه تکه شد و بعد از وی مازیار که از خاندان اصیل ایرانی بود تکه تکه گردید و دهها نمونه دیگر . با این تفاصیل از فضای وحشت و غارت گری و تقدس ویرانگر و عقب افتاده گی های فکری اعراب در ایران فیلسوف ایرانی که خود را عاری از هرگونه عرب گرایی و دین نمایی میداند زبانزد روزگار خود میشود و این تنها به آن دلیل است که متانت و زندگی ساده و بدون هرزگی و مملو از علم و دانش را برای خود بر می گزیند . او بگفته تاریخ نگاران عصبی گوشه گیر و آرام بوده است . میتوان دلیل این اخلاق او را در این سخن برنارد شاو دید :
از برناردشاو پرسیدند چرا از جمع دوری میکنی و خلوت و سکوت را برگزیده ای ؟ وی پاسخ داد از معاشرت با مردمان نافهم رنج میربم
خیام شاید چنین بوده است و از مردمانی که زندگی را تنها در تفکرات کودکانه و واپس گرا میدیده اند به تنگ آمده بود و دوری از اجتماع را گزیده بود . نهایت وی در سال 517 هجری قمری بعد از گذشت حدود هفتاد و اندی سال از عمر پربرکتش بدرسود حیات گفت .
شرح زير درباره خيامي بقلم ميرزا محمدخان قزويني آمده است:
خواجه امام عمرخيامي ابوالفتح بن ابراهيم الخيامي او الخيام النيسابوري از مشاهير حکماء و رياضيين اواخر قرن پنجم و اوائل قرن ششم هجري و يکي از مفاخر بزرگ ايران است ولي شهرت فوق العادهاي که در بلاد شرق و در اين اواخر در اروپا و آمريکا بهم رسانيده همانا بيشتر يا فقط بواسطه رباعيات حکمت آميزي است که دراوقات فراغت تفريح خاطر را اين دانشمند مي سرود و ساير فضائل ومناقب او در تحت الشعاع شعر مستور مانده است. با توجه به تحقيقات جامع پروفسور ادوارد براون معلوم ميگردد که اولا لقب او در غالب کتب عربي که متضمن ترجمه حال اوست و همچنين در صدر رساله جبرو مقابله او خيامي است با ياء نسبت و در غالب کتب فارسي و در رباعيات خود او هميشه خيام بدون ياء نسبت آمده پس هر دو شکل صحيح است و صحت هرکدام باعث بطلان ديگري نيست و اختلاف تعبير برحسب اختلاف زبان عربي و فارسي است. ثانيا کتبي که در آنها ذکري ازعمرخيامي شده است خواه متضمن ترجمه حال او بوده يا فقط اشاره اي بنام او شده باشد برحسب ترتيب زماني از قرار ذيل است: قديمی ترين کتابي که ذکري از عمرخيام نموده چهارمقاله عروضي سمرقندي معاصر خيام بوده و در سنه 506. ق در بلخ ( از شهرهای خراسان بزرگ که امروزه در افغانستان است ) در مجلس انس بخدمت او رسيده است و در سنه 530 ه . ق. در نيشابور قبر او را زيارت کرده و دو حکايت را که در باب عمرخيامي ذکر ميکند اصح و اقدم مآخذ ترجمه حال اوست. بعد از چهارمقاله اقدم مواضعي که نامي ازعمرخيامي در آن برده شده است در اشعار خاقاني شرواني است که به اصح اقوال در سنه 595 ه . ق. وفات يافته است در يکي از قصايد خود گويد:
زان عقل بدو گفت که اي عمرعثمان هم عمر خيامي و هم عمر خطاب
يعني در علم هم داراي اولين مرتبهاي مانند عمرخيامي و هم در عدل صاحب برترين درجه چون عمربن خطاب. بعد از اشعار خاقاني شيخ نجم الدين ابوبکر رازي معروف به دايه در کتاب مرصادالعباد که بسنه 620 ه . ق تاليف شده است بتقريبي ذکري از عمر خيامي نموده و عين عبارتش اين است: .. معلوم که روح پاک علوي و روحاني را درصورت خاک سفلي ظلماني کشيدن چه حکمت بود و باز مفارقت دادن وقطع تعلق روح از قالب کردن و خرابي صورت چراست و باز در حشرقالب را نشرکردن و کسوت روح ساختن سبب چيست آنکه از زمره اولئک کلا انعام بل هم اضل بيرون آيد و بمرتبه انساني رسد و از حجاب غفلت يعلمون ظاهرا من الحيوة الدنيا و هم عنالآخرة غافلون خلاص يابد وقدم بذوق و شوق در راه سلوک نهد و آن بيچاره فلسفي و دهري وطبايعي که از اين هر دو مقام محرومند و سرگشته و گمگشته تا يکي رااز فضلاء که بنزد ايشان بفضل و حکمت و کياست و معرفت مشهور است و آن عمرخيامي است از غايت حيرت اين بيت مي بايد گفت:
در دايرهاي کآمدن و رفتن ماست آنرا نه بدايت نه نهايت پيداست
کس مينزند دمي درين عالم راست کاين آمدن از کجا و رفتن بکجاست.
دارنده چو ترکيب طبايع آراست باز از چه قبل فکند اندر کم و کاست
گر زشت آمد پس اين صور عيب کراست ور نيک آمد خرابي از بهر چراست.
خیام و تجزیه و تحلیل آیات قرآنی
حکیم فرزانه عمر خیام نیشابوری در هیچ کجای آثار خود از دینگرایی بودن خود و دعوت مردم به دین محوری در زندگی سخنی نگفته . بلکه دعوت به انسان بودن و بزرگ منشی را برای جهان باقی گذاشت . با این حال او به گفته علی ابن زید بیهقی حتی در بررسی آیات قرانی چیره گی خواصی داشت به طوری که روزی در مجلس عبدالرزاق فردی سوالی درباره یکی از آیات قرآنی نمود و تنها خیام ساعتها آن را موشکافی و بررسی نمود که سپس همگان از بزرگی فکر او تحسینهای بسیاری داشتند به طوری که گفتند : خداوند امثال شما دانشمندان را زیاد کند و جهان را از وجود امامی مانند خیام خالی ندارد . با اینکه حوزه علمی خیام ریاضیات و فلسفه است ولی او در موضوعات مختلف حتی اسلامی اطلاعات وسیعی داشت است .
خیام از دید بزرگان ایرانی و جهان
ارنست رنان : خیام نمونه برجسته آزاد اندیشی آریاییها بوده است . او پیوسته میکوشید تا گردن خود را از دست قوانین خشک و انعطاف ناپذیر اعراب رها کند .
عمادالدین کاتب قزوینی در کتاب خریده القصر که مربوط به شعارای اسلامی است و 55 سال بعد از مرگ خیام نوشته شده است ( 570 هجری ) می گوید : عمر خیام در عصر خود بی مانند بود و در علم نجوم و حکمت ضرب المثل زمان .
ابوالحسن بیهقی : خیام مسلط بر تمام اجزای حکمت و ریاضیات و معقولات بود .
زمخشری دانشمند معروف : خیام را حکیم جهان و فیلسوف گیتی نامیده است .
قفطی در تاریخ الحکما در قرن ششم میگوید : امام خراسان ( خیام ) و علامه دوران بر دانش یونان مسلط بود و باید در سیاست مدنی از او پیروی کرد . او خداشناسی را در اجتناب از شهوات جسمی میدانست . که این امر مستلزم تزکیه نفس است .
عروضی سمرقندی در زمستان 508 سلطان کس بفرستاد تا خیام را بیاورند تا درباره رفتن شکار سلطان نظر بدهد و هوا را بررسی نماید . در جای دیگر خلیفه بغداد برای جنگ با دشمنان از حاکم سلجوقی کمک میخواهد و او منجمان را احضار میکند که نظر دهند ولی نظر آنان منفی بود و حاکم خشمگین شد . منجمان گفتند اگر باور ندارید از امام خیام نظر بخواهید نظر ما نظر اوست .
اتمام التتمه : فیلسوف حجه الحق عمر بن ابراهیمی خیام از تمام حکمای خراسان بالاتر و پرمایه تر و در ریاضیات بر همگان فزونی داشت . روزی درباره معذوتین ( آیات قرانی ) از خیام سوال شد و او ساعتها درباره اش بحث نمود به طوری که همگان شگفت زده شدند .
محقق روسی یوگنی برتلس در مقدمه کتابش درباره خیام میگوید : برهمگان واضح است که خیام ریاضی دان و فیلسوف ایرانی در روزگار خود با چه دشواریهایی روبرو بوده است . حتی مورخین شریعت اسلامی تفکرات او را مارهای زهر آگین و گزنده شریعت اسلام میدانستند . به نظر میرسد خیام در جلسات علمی اش سروده هایی جنجالی میگفته است که آنها از ترس حاکم شرع دهان به دهان آنرا چرخانده اند و امروز به ما رسیده است .
معتبرترین اسنادی که درباره خیام نوشته اند عبارت است از : مرصاد العباد - تاریخ جهانگشایی جوینی - تاریخ گزیده - نزه المجالس - مونس الاحرار و . . .
خیام و دین
فیلسوف ایرانی را میتوان فراتر از دین و قواعد اسلامی روزگار خود دانست . او به درجه ای از انسانیت , کمال , علم , عرفان و خداباوری رسیده بود که احکام روزمره دینی در نزدش غیر معقول بوده است و دهها بار دست به شکوه و شکایت از آنان زده بود . جدا از اینکه دکانداران دین همیشه برای رسیدن به منافع شخصی و عقاید شخصی خود عرصه را بر مردم تنگ مینمودند . هدف از دین کمال انسانیت و خرد و دانش است و خیام به آن درجه از عرفان و بزرگی رسیده بود که نیازی به آنان نداشت . او بدون تردید ایرانی اصیل و بدور از هرگونه خرافات مذهبی و دینی بود . وی با بجای گذاشتن کتاب نوروزنامه ثابت نمود که به دین نیاکانش در دوره باستان علاقه وافری دارد و احترانی خاصی برای پیامبر ایران باستان قائل است و جشنهای ایرانی ( فروردینگان - خردادگان - مهرگان - سده - نوروز و . . . ) برایش اهمیت خاصی داشته است و در جهت ماندگاری فرهنگ ایرانی تلاش نموده است . این عقیده خیام بدون شک از اساتید خود یعنی محمد ابن زکریای رازی و ابن سینا گرفته شده بود . زکریای رازی در قرن سوم با صراحت کامل اعلام کرد : "عقل بزرگترین موهبت خداوند است و به مدد آن میتوان در این دنیا و آن دنیا سعادتمند شد و به یاری خرد و دانش و تفکر از وجود انبیا مستغنی و بی نیاز هستیم" .خیام نیز بارها از عقاید اسلامگرایان و باورهایشان گله مند است و میگوید :
می میخورم و مخالفان از چپ و راست گویند مخور باده که دین را اعداست
چون دانستم می عدو دین است والله بخورم خون عدو را که رواست
ای صاحب فتوی ز تو پر کارتریم با اینهمه مستی ز تو هشیارتریم
تو خون کسان خوری و ما خون رزان انصاف بده کدام خونخوار تریم
خیام که کوزه در سبو کرد آخر کار همه عاشقان نکو کرد آخر
افسار نماز و پوزه بند روزه از گردن این خران فرو کرد آخر
گویند مخور "می" که به شعبان نه رواست نه نیز رجب که آن مه خاص خداست
شعبان و رجب مه خدایست و رسول "می" در رمضان خوریم که آن خواصه ماست
تو غره بدانی که می نخوری صد کار کنی که می غلام است آنرا
تا توانی خدمت رندان کن بنیاد نماز و روزه ویران کن
بشنو سخن راست ز خیام عمر می خور و ره زن و احسان کن
تا چند زنم بروی دریاها خشت بیزا شدم ز بت پرستان کنشت
خیام که گفت دوزخی خواهد بود ؟ که رفت به دوزخ و که آمد ز بهشت ؟
ما با می و معشوق و شما دیر و کنشت ما اهل جحیمیم ( جهنم ) و شما اهل بهشت
تقصیر من از روز ازل چیست ؟ بگو نقاش چنین بلوح تقدیر نوشت
رباعیات خیام در جهان
گفتار فلسفی این بزرگ مرد ایرانی در جهان امروز به تمام زبانهای دنیا ترجمه شده است و در بسیاری از دانشگاه معتبر جهان کتب وی تدریس می شود . به راستی جهان به این پیر خرد ایرانی میبالد .
پرفسور آرتور کریستن سن از میان 1213 رباعی موجود در کتابخانه های جهانی بریتانیا - ملی پاریس - برلن - لنین گراد اکسفرد و کلکته و نسخه های خطی مونس الاحرار که ننسوب به خیام فیلسوف است تنها 121 رباعی را متعلق به خیام میداند .
مرحوم صادق هدایت نیز در سال 1313 دست به تحقیقات وسیعی درباره خیام زد . وی رباعیات اصلی را با مدارک جمع آوری نمود و چاپ کرد .
مرحوم فروغی نیز در سال 1320 کارهای بسیار مفید برای انتخاب رباعیات حقیقی خیام انجام داد و به چاپ رساند .
تا سال 1960 نیز بیش از 3000 کتاب و رساله درباره خیام نوشته شده است .
آقای مینویی مقالات به چاپ رسیده شده درباره خیام را تا سال 1929 بیش از 1500 مقاله میداند که فقط در آمریکا شمالی و اروپا چاپ شده است . که امروزه هزاران برابر این آمار است .
منظومه فیتز جرالد ( 1875 ) که توسط این فرد انگلیسی جمع آوری شد را میتوان نخستین اثر جهانی از خیام دانست که تبلیغ وسیعی در جهان توسط منظومه او انجام شد .
استاد سعید نفیسی پس از تحقیقات وسیعی درباره خیام گفت رباعیات خیام تا سال 1925 :
سي و دو بار انگليسي - شانزده بار فرانسوي - يازده بار اردو - دوازده بار آلماني - چهار بار روسي - چهار بار ترکي - پنج بار ايتاليايي - هشت بار عربي و چند بار به ارمني و سوئدي و دانمارکي ترجمه شد و تا امرزو ثابت شده است که رباعياتش به تمام زبانهاي زنده دنيا ترجمه شده است . رباعیات جهانی خیام نام و فرهنگ ایران را برای ابدیت زنده نگه داشته است . تندیس این بزرگ مرد ایرانی , اسطوره مشرق زمین در دانشگاه فلورنس ایتالیا نصب گردیده است و حسین فخیمی مسئول ساخت این تندیس شده بود . هر ساله در 28 اردیبهشت ماه یاد و گرامیداشت او در نیشابور برقرار میگردد و مردم بسیاری از شهرهای گوناگون بر مزار پاک این فیلسوف , عارف و ستاره شناس بزرگ ایرانی گردهم می آیند . یادش گرامی . روحش شاد .
سنگ آرامگه عمر خیام در نیشابور خراسان - کل مقبره باشکوه این بزرگ مرد تاریخ به فرمان رضا شاه ساخته شد . آرامگاه بزرگان دیگری همچون عطار عارف نامدار و کمال الملک نیز در کنار آرامگاه خیام می باشد .
در عکس شبیه سازی شده بالا پروژه افلاک نما خیام دیده می شود . به همت مردم و دولت , بزرگ ترین پایگاه ستاره شناسی خاورمیانه در کنار آرامگاه خیام فیلسوف در حال ساخت است . بیشتر هزینه این طرح بزرگ را یک ایرانی نیکوکار بر عهده گرفته است . این حرکت بزرگ به پاس گرامی داشت حکیم فرزانه در حال انجام است تا یادش برای ابد گرامی داشته شود . که تا کنون حدود نیمی از این پروژه اجرا شده است . در عکس زیر مرحله ساخت آن در سال 86 دیده می شود .
پژوهش شادروان صادق هدایت پیرامون عمر خیام
پژوهش دکتر امیر حسین خنجی پیرامون رباعیات عمر خیام
حکیم فرزانه ابوالقاسم فردوسی طوسی

شاهنامه آموزنده ترین کتاب ادبی و فرهنگی جهان
فردوسي استاد بي همتاي شعر و خرد ایران زمین و بزرگترين حماسه سراي جهان است. اهميت فردوسي در آن است چه با آفريدن اثر هميشه جاويد خود، نه تنها زبان ، بلكه كل فرهنگ و تاريخ و در يك سخن ، همه اسناد اصالت اقوام ايراني را جاودانگي بخشيد و خود نيز برآنچه كه ميكرد و برعظمت آن ، آگاه بود و مي دانست كه با زنده نگه داشتن زبان ويژه يك ملت ، در واقع آن ملت را زندگي و جاودانگي بخشيده است . شاهنامه متعلق به همه اقوام ایرانی از کرد تا آذری و لر و بلوچ و خراسانی و گیلکی است و همه در این کتاب اقوام آریایی ایران نامیده شده اند . یونسکو شاهنامه فردوسی را یکی از 3 اثر برجسته جهان معرفی نمود . به راستی هیچ ملتی به جز ایرانیان این موهبت بزرگ را نداشته اند که این کتاب جهانی - انسان ساز - فرهنگ پرور که کل تاریخ و فرهنگ نیاکانشان را گردآوری کرده باشد را داشته باشند .
هر ایرانی که شاهنامه را با عمق وجودش درک کند هرگز از راه درستی و انسانیت خارج نمی شود و به اوج پیشرفت و دانش و کما خواهد رسید . یکی از مشکل ما ایرانیان امروز این است که با هویت خود بیگانه هستیم . شاهنامه به هیچ وجه یک کتاب داستانی و جنگی نمی باشد بلکه باشکوه ترین نظم تاریخی جهان است که تمامی نوشتار آن آموزنده و درس زندگی است . نادر شاه بزرگ نیز پس از نجات ایران زمین چنین گفت : شاهنامه فردوسی خردمند ، راهنمای من در طول زندگی بوده است :
چنین است رسم سرای سپنج نمانی درو جاودانه مرنج
نه دانا گذر یابد از چنگ مرگ نه جنگ آوران زیر خفتان و ترگ
اگر شاه باشی و گر زرتشت نهالی ز خاکست و بالین ز خشت
چنان دان که گیتی ترا دشمن است زمین بستر و گور پیراهن است
اگر چرخ گردان کشد زین تو سرانجام خشت است بالین تو
دلت را به تیمار چندین مبند پس ایمن مشو از سپهر بلند
تو بیجان شوی او بماند دراز حدیثی دراز است چندین مناز
اوج ملی گرایی در سروده های فردوسی بزرگ به وضوح دیده می شود . او به راستی ایران را پس از دو قرن دهشتناک حمله بادیه نشیان عرب به بهانه گسترش اسلام رهایی بخشید :
سیاوش منم نه از پریزادگان از ایرانم از شهر آزادگان
که ایران بهشت است یا بوستان همی بوی مشک آید از بوستان
سپندارمذ پاسبان تو ( ایران ) باد ز خرداد روشن روان تو باد
ندانی که ایران نشست من است جهان سر به زیر دست من است
هنر نزد ایرانیان است و بس ندادند شیر ژیان را به کس
همه یکدلانند و یزدان شناس به نیکی ندارند از بد هراس
دریغ است که ایران ویران شود کنام شیران و پلنگان شود
همه جای جنگی سواران بدی نشستن گه شهریاران بدی
چو ایران نباشد تن من مباد بر این بوم و بر زنده یک تن مباد
همه روی یکسر به جنگ آوریم جهان بر بد اندیش تنگ آوریم
ز بهر بر و بوم و پیوند خویش زن و کودک وخرد و فرزند خویش
همه سر به تن کشتن دهیم از آن به که کشور به دشمن دهیم
فردوسي در سال 329 هجري برابر با 940 ميلادي در روستاي باژ از توابع طوس در خانواده اي از طبقه دهقانان ديده به جهان گشود و در جواني شروع به نظم برخي از داستانهاي قهرماني كرد. در سال 370 هجري برابر با 980 ميلادي زير ديد تيز و مستقيم جاسوس هاي بغداد و غزنين ، تنظيم شاهنامه را آغاز مي كند و به تجزيه و تحليل نيروهاي سياسي بغداد و عناصر ترك داخلي آنها مي پردازد. فردوسي ضمن بيان مفاسد آنها، نه تنها با بغداد و غزنين ، بلكه با عناصر داخلي آنها نيز مي ستيزد و در واقع ، طرح تئوري نظام جانشين عرب و ترك را مي ريزد حداقل آرزوي او اين بود كه تركيبي از اقتدار ساسانيان و ويژگيهاي مثبت سامانيان را در ايران ببيند. چهار عنصر اساسي براي فردوسي ارزشهاي بنيادي و اصلي به شمار مي آيد و او شاهنامه خود را در مربعي قرار داده كه هر ضلع آن بيانگر يكي از اين چهار عنصر است آن عناصر عبارتند از: مليت ايراني ، خردمندي ، عدالت و دين ورزي او هر موضوع و هر حكايتي را برپايه اين چهار عنصر تقسيم مي كند. علاوه بر اين ، شاهنامه ، شناسنامه فرهنگي ما ايرانيان است كه مي كوشد تا به تاخت و تاز ترك هاي متجاوز و امويان و عباسيان ستمگر پاسخ دهد او ايراني را معادل آزاده مي داند و از ايرانيان با تعبير آزادگان ياد مي كند؛ بدان سبب كه پاسخي به ستمهاي امويان و عباسيان نيز داده باشد؛ چرا كه مدت زمان درازي ، ايرانيان ، موالي خوانده مي شدند و با آنان همانند انسان هاي درجه دوم رفتار مي شد بنابراين شاهنامه از اين منظر، بيش از آن كه بيان انديشه ها و نيات يك فرد باشد، ارتقاي نگرشي ملي و انساني و يا تعالي بخشيدن نوعي جهانبيني است.
سي سال بعد يعني در سال 400 هجري برابر با 1010 ميلادي پس از پايان خلق شاهنامه اين اثر گرانبها به سلطان محمود غزنوي نشان داده مي شود. به علت هاي گوناگون كه مهمترينشان اختلاف نژاد و مذهب بود اختلاف دستگاه حكومتي با فردوسي باعث برگشتن فردوسي به طوس و تبرستان شد. استاد بزرگ شعر فارسي در سال 411 هجري برابر با 1020 ميلادي در زادگاه خود بدرود حيات گفت ولي ياد و خاطره اش براي همه دوران در قلب ايرانيان جاودان مانده است.
زبان ، شرح حال انسان هاست اگر زبان را برداريم ، تقريبا چيزي از شخصيت ، عقايد، خاطرات و افكار نظام يافته ما باقي نخواهد ماند بدون زبان ، موجوديت انسان هم به پايان مي رسد زبان ، ذخيره نمادين انديشه ها، عواطف ، بحران ها، مخالفت ها، نفرت ها، توافق ها، وفاداري ها، افكار قالبي و انگيزه هايي است كه در سوق دادن و تجلي هويت فرهنگي انسانها نقش اساسي دارد.همگان بر اين باورند كه واژه ها در كارگاه انديشه و جهان بيني انديشمندان و روشنفكران هر دوره در هم مي آميزند تا زايش مفاهيم عميق انساني تا ابد تداوم يابد. با وجود اين ، در يك داوري دقيق ، تمايزات غيرقابل كتمان و قوت كلام سخنسراي نام آور ايراني حكيم ابوالقاسم فردوسي با همتايان همعصر خود آشكارا به چشم مي خورد زبان و كلمات برآمده از ذهن فرانگر و تيزبين او، در محدوديت قالبهاي شعري ، تن به اسارت نمي سپارد و ناگزير به گونه شگفت آوري زنده ، ملموس و دورپرواز است فردوسي به علت ضرورت زماني و جو اختناق حاكم در زمان خود، بالاجبار براي بيان مسائل روز: زباني كنايه و اسطوره اي انتخاب كرده است ؛ در حالي كه محتواي مورد بحث او مسائل جاري زمان است بدين اعتبار، فردوسي از معدود افرادي است كه توان به تصوير كشيدن جنايات قدرت سياسي زمان خويش را داشته است پايان سخن آن كه انگيزه فردوسي از آفريدن شاهنامه مبارزه با استعمار و استثمار سياسي ، اقتصادي و فرهنگي خلفاي عباسي و سلطه اميران ترك بود .
شادروان ملک الشعرای بهار می فرماید :
آنچه كورش كرد و دارا وانچه زرتشت مهين زنده گشت از همت فردوسي سحـر آفرين
نام ايــــران رفته بــود از يـاد تا تـازي و تـرك تركــتــازي را بــرون راندند لاشـــه از كـمين
اي مبـــارك اوستـــاد‚ اي شاعـــر والا نژاد اي سخنهايت بســوي راستي حبلي متين
با تـــو بد كـــردند و قــدر خدمتت نشناختند آزمـــنـــدان بــخيـــل و تاجـــداران ضـنــيــن
انوری در ستایش از فردوسی بزرگ می فرماید :
آفرین بـر روان فــــردوسی آن همایـون همای ِ فـرخنده
او نه استاد بود و ما شاگِرد او خــداونــد بود و مـا بنده
زندگی نامه حکیم ابوالقاسم فردوسی
حکیم فردوسی در "طبران طوس" در سال 329 هجری به دنیا آمد. پدرش از دهقانان طوس بود و از نظر مادی دارای ثروت و موقعیت قابل توجهی بود. از احوال او در عهد کودکی و جوانی اطلاع درستی در دست نیست ولی مشخص است که در جوانی با درآمدی که از املاک پدرش داشته به کسی محتاج نبوده است؛ اما اندک اندک آن اموال را از دست داده و به تهیدستی گرفتار شده است. فردوسی از همان ابتدای کار که به کسب علم و دانش پرداخت، به خواندن داستان هم علاقمند شد و مخصوصاً به تاریخ و اطلاعات مربوط به گذشته ایران عشق می ورزید. همین علاقه به ایران و تمدن کهن ایرانی بود که او را به فکر به نظم در آوردن متون باستانی و دینی ایرانیان به صورت شاهنامه انداخت. چنان که از گفته خود او در شاهنامه بر می آید، مدتها در جستجوی این کتاب بوده است و پس از یافتن نسکهای پهلوی و اوستایی و کتیبه های کهن ایرانی آنها را به صورت داستانهای شیرین و آموزنده شاهنامه در آورد و نزدیک به سی سال از بهترین ایام زندگی خود را وقف این کار کرد.
او خود می گوبد:
بسی رنج بردم بدین سال سی عجم زنده کردم بدین پارسی
پی افکندم از نظم کاخی بلند که از باد و باران نیابد گزند
بناهای آباد گردد خراب ز باران و از تابش آفتاب
فردوسی در سال 370 یا 371 به نظم در آوردن شاهنامه را آغاز کرد و در اوایل این کار هم خود فردوسی ثروت و دارایی قابل توجهی داشت و هم بعضی از بزرگان خراسان که به تاریخ باستان ایران علاقه داشتند او را یاری می کردند ولی به مرور زمان و پس از گذشت سالهایی، در حالی که فردوسی بیشتر شاهنامه را سروده بود دچار فقر و تنگدستی شد.
اَلا ای برآورده چرخ بلند چه داری به پیری مرا مستمند
چو بودم جوان برترم داشتی به پیری مرا خوار بگذاشتی
به جای عنانم عصا داد سال پراکنده شد مال و برگشت حال
بر خلاف آن چه مشهور است، فردوسی سرودن شاهنامه را صرفاً به خاطر علاقه خودش و حتی سالها قبل از آن که سلطان محمود به سلطنت برسد، آغاز کرد؛ اما چون در طی این کار رفته رفته ثروت و جوانی را از دست داد، به فکر افتاد که آن را به نام پادشاهی بزرگ کند و به گمان اینکه سلطان محمود چنان که باید قدر او را خواهد شناخت، شاهنامه را به نام او کرد و راه غزنین را در پیش گرفت.
اما سلطان محمود که به مدایح و اشعار ستایش آمیز شاعران بیش از تاریخ و داستانهای پهلوانی علاقه داشت، قدر سخن فردوسی را ندانست و او را چنانکه شایسته اش بود تشویق نکرد. علت این که شاهنامه مورد پسند سلطان محمود واقع نشد، درست معلوم نیست.
عضی گفته اند که به سبب بدگوئی حسودان، فردوسی نزد محمود به بی دینی متهم شد و از این رو سلطان به او بی اعتنائی کرد. ظاهراً بعضی از شاعران دربار سلطان محمود به فردوسی حسد می بردند و داستانهای شاهنامه و پهلوانان قدیم ایران را در نظر سلطان محمود پست و ناچیز جلوه داده بودند.
به هر حال سلطان محمود شاهنامه را بی ارزش دانست و از رستم به زشتی یاد کرد و بر فردوسی خشمگین شد و گفت: که "شاهنامه خود هیچ نیست مگر حدیث رستم، و اندر سپاه من هزار مرد چون رستم هست". گفته اند که فردوسی از این بی اعتنائی سلطان محمود بر آشفت و چندین بیت در هجو سلطان محمود گفت و سپس از ترس مجازات او غزنین را ترک کرد و چندی در شهرهائی چون هرات، ری و طبرستان متواری بود و از شهری به شهر دیگر می رفت تا آنکه سرانجام در زادگاه خود، طوس درگذشت. تاریخ وفاتش را بعضی 411 و برخی 416 هجری قمری نوشته اند. فردوسی را در شهر طوس، در باغی که متعلق به خودش بود، به خاک سپردند.
آرامگاه باشکوه حکیم فرزانه فردوسی در هزارمین سال ولادت وی به فرمان رضا شاه پهلوی پس از دعوت از بزرگ ترین خاورشناسان - شاهنامه شناسان و ایران شناسان جهان در داخل باغ خود فردوسی بنا گشت . برای ساخت این مجموعه زیبا از بزرگ ترین معاران ایران بهره برده شد . سرستونهای شهر پارسه ( تخت جمشید ) و نشان ملی فروهر زرتشت نیز از مهم ترین آثار این آرامگاه است . داخل آن نیز با صحنه های سنگ تراشی شده از نبردهای ایرانیان مزین شده است .
در تاریخ آمده است که چند سال بعد، محمود به مناسبتی فردوسی را به یاد آورد و از رفتاری که با آن شاعر آزاده کرده بود پشیمان شد و به فکر جبران گذشته افتاد و فرمان داد تا ثروت فراوانی را برای او از غزنین به طوس بفرستند و از او دلجوئی کنند. اما چنان که نوشته اند، روزی که هدیه سلطان را از غزنین به طوس می آوردند، جنازه شاعر را از طوس بیرون می بردند. از فردوسی تنها یک دختر به جا مانده بود، زیرا پسرش هم در حیات پدر فوت کرده بود و گفته شده است که دختر فردوسی هم این هدیه سلطان محمود را نپذیرفت و آن را پس فرستاد. شاهنامه نه فقط بزرگ ترین و پر مایه ترین مجموعه شعر است که از عهد سامانی و غزنوی به یادگار مانده است بلکه مهمترین سند عظمت زبان فارسی و بارزترین مظهر شکوه و رونق فرهنگ و تمدن ایران قدیم و خزانه لغت و گنجینه ادبـیات فارسی است. فردوسی طبعی لطیف داشته، سخنش از طعنه و هجو و دروغ و تملق خالی بود و تا می توانست الفاظ ناشایست و کلمات دور از اخلاق بکار نمی برد. او در وطن دوستی سری پر شور داشت. به داستانهای کهن و به تاریخ و سنن قدیم عشق می ورزید.
ویژگیهای هنری شاهنامه
"شاهنامه"، حافظ راستین سنت های ملی و شناسنامه قوم ایرانی است. شاید بی وجود این اثر بزرگ، بسیاری از عناصر مثبت فرهنگ آبا و اجدادی ما در طوفان حوادث تاریخی نابود می شد و اثری از آنها به جای نمی ماند.
گرت زین بد آید، گناه من است
چنین است و آیین و راه من است
بر این زادم و هم بر این بگذرم
چنان دان که خاک پی حیدرم
فردوسی با خلق حماسه عظیم خود، فرهنگ ایران را به بهترین روش ممکن از یورش اعراب بایده نشین رهایی بخشید . اهمیت شاهنامه فقط در جنبه ادبی و شاعرانه آن خلاصه نمی شود و پیش از آن که مجموعه ای از داستانهای منظوم باشد، تبارنامه ای است که بیت بیت و حرف به حرف آن ریشه در اعماق آرزوها و خواسته های جمعی، ملتی کهن دارد. ملتی که در همه ادوار تاریخی، نیکی و روشنایی را ستوده و با بدی و ظلمت ستیز داشته است. شاهنامه، منظومه مفصلی است که حدوداً از شصت هزار بیت تشکیل شده است و دارای سه دوره اساطیری، پهلوانی، تاریخی است. فردوسی بر منابع بازمانده کهن، چنان کاخ رفیعی از سخن بنیان می نهد که به قول خودش باد و باران نمی تواند گزندی بدان برساند و گذشت سالیان بر آن تأثیری ندارد. در برخورد با قصه های شاهنامه و دیگر داستانهای اساطیری فقط به ظاهر داستانها نمی توان بسنده کرد. زبان قصه های اساطیری، زبانی آکنده از رمز و سمبل است و بی توجهی به معانی رمزی اساطیر، شکوه و غنای آنها را تا حد قصه های معمولی تنزل می دهد.
حکیم فردوسی خود توصیه می کند که تو هرگز این نوشتار من را دورغ مدان زیرا او می دانست که تمامی نوشتارش برگفته شده از متون کهن پهلوی ساسانی و اوستایی باستانی است :
تو این را دوغ و فسانه مدان به یکسان روش در زمانه مدان
از او هر چه اندر خورد با خرد دگر بر ره رمز معنی برد
شاهنامه روایت نبرد خوبی و بدی است و پهلوانان، جنگجویان این نبرد دائمی در هستی اند.جنگ کاوه و ضحاک ظالم، کین خواهی منوچهر از سلم و تور، مرگ سیاوش به دسیسه سودابه و . . . همه حکایت از این نبرد و ستیز دارند. تفکر فردوسی و اندیشه حاکم بر شاهنامه همیشه مدافع خوبی ها در برابر ظلم و تباهی است. ایران که سرزمین آزادگان محسوب می شود همواره مورد آزار و اذیت همسایگانش قرار می گیرد. زیبایی و شکوه ایران، آن را در معرض مصیبت های گوناگون قرار می دهد و از همین رو پهلوانانش با تمام توان به دفاع از موجودیت این کشور و ارزشهای عمیق انسانی مردمانش بر می خیزند و جان بر سر این کار می نهند. برخی از پهلوانان شاهنامه نمونه های متعالی انسانی هستند که عمر خویش را به تمامی در خدمت همنوعان خویش گذرانده است. پهلوانانی همچون فریدون، سیاوش، کیخسرو، رستم، گودرز و طوس از این دسته اند. شخصیت های دیگری نیز همچون ضحاک و سلم و تور وجودشان آکنده از شرارت و بدخویی و فساد است. آنها مأموران اهریمنند و قصد نابودی و فساد در امور جهان را دارند. قهرمانان شاهنامه با مرگ، ستیزی هماره دارند و این ستیز نه روی گردانی از مرگ است و نه پناه بردن به کنج عافیت، بلکه پهلوان در مواجهه و درگیری با خطرات بزرگ به جنگ مرگ می رود و در حقیقت، زندگی را از آغوش مرگ می دزدد. اغلب داستانهای شاهنامه بی اعتباری دنیا را به یاد خواننده می آورد و او را به بیداری و درس گرفتن از روزگار می خواند ولی در همین حال آنجا که هنگام سخن عاشقانه می رسد فردوسی به سادگی و با شکوه و زیبایی موضوع را می پروراند. نگاهی به پنج گنج نظامی در مقایسه با شاهنامه، این حقیقت را بر ما نمایان تر می کند. در پنج گنج، شاعر عارف که ذهنیتی تغزلی و زبانی نرم و خیال انگیز دارد، در وادی حماسه چنان غریق تصویرسازی و توصیفات تغزلی شده که جای و مقام زبان حماسه را فراموش کرده است حال آنکه که فردوسی حتی در توصیفات تغزلی در شأن زبان حماسه، از تخیل و تصاویر بهره می گیرد و از ازدحام بیهوده تصاویر در زبان حماسی اش پرهیز می کند.

تصویرسازی
تصویرسازی در شعر فردوسی جایی بسیار مهم دارد. شاعر با تجسم حوادث و ماجراهای داستان در پیش چشم خواننده او را همراه با خود به متن حوادث می برد، گویی خواننده داستان را بر پرده سینما به تماشا نشسته است.
تصویرسازی و تخیل در اثر فردوسی چنان محکم و متناسب است که حتی اغلب توصیفات طبیعی درباره طلوع، غروب، شب، روز و . . . در شعر او حالت و تصویری حماسی دارد و ظرافت و دقت حکیم طوس در چنین نکاتی موجب هماهنگی جزئی ترین امور در شاهنامه با کلیت داستان ها شده است.
چند بیت زیر در توصیف آفتاب بیان شده است:
چو خورشید از چرخ گردنده سر برآورد بر سان زرین سپر
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پدید آمد آن خنجر تابناک به کردار یاقوت شد روی خاک
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چو زرین سپر برگرفت آفتاب سرجنگجویان برآمد ز خواب
و این هم تصویری که شاعر از رسیدن شب دارد:
چو خورشید تابنده شد ناپدید شب تیره بر چرخ لشگر کشید
موسیقی
موسیقی در شعر فردوسی از عناصر اصلی شعر محسوب می شود. انتخاب وزن متقارب که هجاهای بلند آن کمتر از هجاهای کوتاه است، موسیقی حماسی شاهنامه را چند برابر می کند.
علاوه بر استفاده از وزن عروضی مناسب، فردوسی با به کارگیری قافیه های محکم و هم حروفیهای پنهان و آشکار، انواع جناس، سجع و دیگر صنایع لفظی تأثیر موسیقایی شعر خود را تا حد ممکن افزایش می دهد.
اغراقهای استادانه، تشبیهات حسی و نمایش لحظات طبیعت و زندگی از دیگر مشخصات مهم شعر فردوسی است.
برآمد ز هر دو سپه بوق و کوس هوا نیلگون شد، زمین آبنوس
چو برق درخشنده از تیره میغ همی آتش افروخت از گرز و تیغ
هوا گشت سرخ و سیاه و بنفش ز بس نیزه و گونه گونه درفش
از آواز دیوان و از تیره گرد ز غریدن کوس و اسب نبرد
شکافیده کوه و زمین بر درید بدان گونه پیکار کین کس ندید
چکاچاک گرز آمد و تیغ و تیر ز خون یلان دشت گشت آبگیر
زمین شد به کردار دریای قیر همه موجش از خنجر و گرز و تیر
دمان بادپایان چو کشتی بر آب سوی غرق دارند گفتی شتاب
منبع داستانهای شاهنامه
نخستین کتاب نثر فارسی که به عنوان یک اثر مستقل عرضه شد، شاهنامه ای منثور بود. این کتاب به دلیل آن که به دستور و سرمایه "ابومنصور توسی" فراهم آمد، به "شاهنامه ابومنصوری" شهرت دارد و تاریخ گذشته ایران به حساب می آید. اصل این کتاب از میان رفته و تنها مقدمه آن که حدود پانزده صفحه می شود در بعضی نسخه های خطی شاهنامه موجود است. علاوه بر این شاهنامه، یک شاهنامه منثور دیگر به نام شاهنامه ابوالموید بلخی وجود داشته که گویا قبل از شاهنامه ابومنصوری تألیف یافته است، اما چون به کلی از میان رفته درباره آن نمی توان اظهارنظر کرد. پس از این دوره در قرن چهارم شاعری به نام دقیقی کار به نظم در آوردن داستانهای ملی ایران را شروع کرد. دقیقی زردشتی بود و در جوانی به شاعری پرداخت. او برخی از امیران چغانی و سامانی را مدح گفت و از آنها جوایز گرانبها دریافت کرد. دقیقی ظاهراً به دستور نوح بن منصور سامانی مأموریت یافت تا شاهنامه ی ابومنصوری را که به نثر بود به نظم در آورد. دقیقی، هزار بیت بیشتر از این شاهنامه را نسروده بود و هنوز جوان بود که کشته شد (حدود 367 یا 369 هـ. ق) و بخش عظیمی از داستانهای شاهنامه ناسروده مانده بود. فردوسی استاد و هشمهری دقیقی کار ناتمام او را دنبال کرد. از این رو می توان بخش نخست شاهنامه را از دقیقی دانست ولی ادامه و بخش بسیاری دیگر از شاهنامه را فردوسی از متون خدای نام ساسانی و نبشته های پهلوی و اوستایی گردآوری نموده است . بخش های اصلی شاهنامه موضوع این شاهکار جاودان، تاریخ ایران قدیم از آغاز تمدن نژاد ایرانی تا انقراض حکومت ساسانیان به دست اعراب است و کلاً به سه دوره اساطیری، پهلوی و تاریخی تقسیم می شود.
دوره اساطیری
این دوره از عهد کیومرث تا ظهور فریدون ادامه دارد. در این عهد از پادشاهانی مانند کیومرث، هوشنگ، تهمورث و جمشید سخن به میان می آید. تمدن ایرانی در این زمان تکوین می یابد. کشف آتش، جدا کرن آهن از سنگ و رشتن و بافتن و کشاورزی کردن و امثال آن در این دوره صورت می گیرد.
در این عهد جنگها غالباً جنگ های داخلی است و جنگ با دیوان و سرکوب کردن آنها بزرگ ترین مشکل این عصر بوده است. (بعضی احتمال داده اند که منظور از دیوان، بومیان فلات ایران بوده اند که با آریایی های مهاجم همواره جنگ و ستیز داشته اند)
در پایان این عهد، ضحاک دشمن پاکی و سمبل بدی به حکومت می نشیند، اما سرانجام پس از هزار سال فریدون به یاری کاوه آهنگر و حمایت مردم او را از میان می برد و دوره جدید آغاز می شود.
دوره پهلوانی
دوره پهلوانی یا حماسی از پادشاهی فریدون شروع می شود. ایرج، منوچهر، نوذر، گرشاسب به ترتیب به پادشاهی می نشیند. جنگهای میان ایران و توران آغاز می شود.
پادشاهی کیانی مانند: کیقباد، کیکاووس، کیخسرو و سپس لهراست و گشتاسب روی کار می آیند. در این عهد دلاورانی مانند: زال، رستم، گودرز، طوس، بیژن، سهراب و امثال آنان ظهور می کنند.
سیاوش پسر کیکاووس به دست افراسیاب کشته می شود و رستم به خونخواهی او به توران زمین می رود و انتقام خون سیاوش را از افراسیاب می گیرد. در زمان پادشاهی گشتاسب، زرتشت پیغمبر ایرانیان ظهور می کند و اسفندیار به دست رستم کشته می شود.
مدتی پس از کشته شدن اسفندیار، رستم نیز به دست برادر خود، شغاد از بین می رود و سیستان به دست بهمن پسر اسفندیار با خاک یکسان می گردد، و با مرگ رستم دوره پهلوانی به پایان می رسد.
دوره تاریخی
این دوره با ظهور بهمن آغاز می شود و پس از بهمن، همای و سپس داراب و دارا پسر داراب به پادشاهی می رسند.
در این زمان اسکندر مقدونی به ایران حمله می کند و دارا را که همان داریوش سوم است می کشد و به جای او بر تخت می نشیند.
پس از اسکندر دوره پادشاهی اشکانیان در ابیاتی چند بیان می گردد و سپس ساسانیان روی کار می آیند و آن گاه حمله عرب پیش می آید و با شکست ایرانیان شاهنامه به پایان می رسد. فردوسی از یورش سپاه تازی به ایران ناخشنود است و به سختی از آن خرده می گیرد و ملت عرب را که به بهانه گسترش اسلام شهرها و روستاها را یکی پس از دیگری ویران میکردند را به باد انتقاد می گیرد . بسیاری از تاریخ نگاران نبشته اند که پیکر پاک فردوسی بزرگ توسط مسلمانان به خاک سپرده نشده است و آنها وی را غیر مسلمان می دانسته اند . به همین جهت وی در خانه و باغ خود و نه در گورستان مسلمان خاک شد . او برای اعراب چنین جاودانه سروده است :
ز شیر شتر خوردن و سوسمار عرب را به جایی رسیده است کار
کا تخت کیانی کند آروز تفو بر تو ای چرخ گردون تفو
یورش سپاه اسلام و نژاد اصلی این قوم :
چنین است پرگار چرخ بلند که آید بر این پادشاهی گزند ( ساسانی )
از این مار خوار اهرمن چهرگان ( اعراب ) زدانایی و شرم بی بهرگان
نه گنج و نه نام و نه تخت و نه نژاد همی داد خواهند گیتی به باد
تاسف از سرنگونی شاهنشاهی کهن و باستانی ساسانی :
به ایرانیان زار و گریان شدم ز ساسانیان نیز بریان شدم
دریغ آن سروتاج وآن تخت و داد دریغ آن بزرگی و فر و نژاد
کزین پس شکست آید از تازیان ستاره نگردد مگر بر زیان
برین سالیان چار صد بگذرد کزین تخمه گیتی کسی نسپرد
ایرانیان تلاشهای بسیاری برای حفظ یزدگرد سوم را انجام گرفت ولی شوربختانه موفق نشدند :
که من با سپاهی بسختی درم به رنج و غم و شوربختی درم
چو گیتی شود تنگ بر شهریار تو گنج و تن وجان گرامی مدار
کز این تخمه ی نامدار ارجمند نماندست جز شهر یا ر بلند
بکوشش مکن هیچ سستی بکار که چون او نباشد دگر شهریار
ز ساسانیان یادگار اوست و بس کزین پس نبینند ازین تخمه کس
دریغ آن سر و تاج وآن مهرو داد که خواهد شدن تخم شاهی بباد
چون تخت شاهنشاهی ایران که مرکز تمدن و هنر آسیایی بوده است با منبر اعراب بادیه نشین یکی می شود عاقبت کار ملت ایران تیره و تار خواهد شد :
چو با تخت منبر برابر شود همه نام "بوبکر" و "عمٌر" شود
تبه گردد اين رنجهای دراز شود ناسزا شاه گردن فراز
نه تخت و نه ديهيم بينی نه شهر ز اختر همه تازيان راست بهر
برنجد یکی دیگری برخورد به داد و به بخشش کسی ننگرد
ز پیمان بگردند و از راستی گرامی شود کژی و کاستی
پیاده شود مردم جنگجوی سوار آنکه لاف آرد و گفتگوی
رباید همی این از آن آن ازین ز نفرین ندانند باز آفرین
نهانی بتر زآشکارا شود دل شاهشان سنگ خارا شود
بداندیش گردد پدر بر پسر پسر بر پدر همچنین چاره گر
شود بنده ی بی هنر شهریار نژاد و بزرگی نیاید به کار
به گیتی نماند کسی را وفا روان و زبانها شود پر جفا
ازایران واز ترک و از تازیان نژادی پدید آید اندر میان
نه دهقان نه ترک و نه تازی بود سخن ها به کردار بازی بود
همه گنجها زیر دامن نهند بمیرند و کوشش به دشمن دهند
چنان فاش گردد غم ورنج و شور که رامش به هنگام بهرام گور
نه جشن ونه رامش نه کوشش نه کام همه چاره و تنبل و ساز دام
زيان کسان از پی سود خويش بجويند و دين اندر آرند پيش
فردوسی بزرگ به دلیل محدودیتهای بسیار مذهبی که در آن دوران داشته است در لوای شاهنامه سترگ اش برای زنده کردن دین زرتشتی چنین فرموده است :
شود مردمی کیش و آئین ما نگیرد خرد خرده بر دین ما
بیاریم آن آب رفته به جوی مگر زان بیابیم باز آبروی
جدایی از اینکه کل شاهنامه بر پایه های کردار نیک - گفتار نیک و پندار نیک اشو زرتشت اسپنتمان استوار است که از هزاران سال پیش از اسلام در ایران رواج داشته است :
بی آزاری و جام می برگزین که گوید که نفرین به از آفرین ؟
بخور آنچه داری و اندوه مخور که گیتی سپنج است و ما برگذر
میازار کس را از بهر درم مکن تا توانی به کس ستم
ز چیز کسان دور کنید دست بی آزار باشید و یزدان پرست
مجویید آزار همسایگان بویژه بزرگان و پرمایه گان
به پاکی گرائید و نیکی کنید دل و پشت خواهندگان را مشکنید
ز گیتی دو چیز است جاوید و بس دگر هر چه باشد نماند به کس
سخن نغز و کردار نیک بماند چنان تا جهان است یک
ز خورشید و ز آب و از باد و خاک نگردد تبه نام و گفتار پاک
دانلود قسمتی از شاهنامه فردوسی بزرگ به زبان انگلیسی
دانلود متن کامل شاهنامه سترگ به زبان پارسی
نوروز باستانی در شاهنامه فردوسی
مولانا جلال الدین محمد بلخی
پدر عرفان جهان
بجوشید , بجوشید , که ما اهل شعاریم بجز عشق , به جز عشق , دگر کار نداریم
درین خاک , درین خاک , درین مزرعه پاک بجز مهر , بجز عشق , دگر تخم نکاریم
چه مستیم , چه مستیم , از آن شاه که هستیم بیایید , بیایید , که تا دست برآریم
چه دانیم , چه دانیم , که ما دوش چه خوردیم که امروز همه روز خمیریم و خماریم
مپرسید , مپرسید , ز احوال حقیقت که ما باده پرستیم نه پیمانه شماریم
شما مست نگشتید وز آن باده نخوردید چه دانید , چه دانید , که ما در چه شکاریم
نیفتیم برین خاک ستان ما نه حصیریم بر آییم برین چرخ که ما مرد حصاریم
.............................................
ز خاک من اگر گندم بر آید از آن اگر نان پزی مستی فزاید
خمیر و نانوا دیوانه گردد تنورش بیت مستانه سراید
اگر بر گور من آیی زیارت تو را خر پشته ام رقصان نماید
میا بی دف بر گور من برادر که در بزم خدا غمگین نشاید
.............................................
عاشق همه سال مست و رسوا بادا دیوانه و شوریده و شیدا بادا
با هشیاری , غصه هر چیز خوریم چون مست شدیم هر چه بادا بادا
.............................................
من اگر دست زنانم نه من از دست زنانم نه ازینم نه از آنم من از آن شهر کلانم
نه پی زمر و قمارم نه پی خمر و عقارم نه خمیرم نه خمارم نه چنینم نه چنانم
من اگر مست و خرابم نه چو تو مست شرابم نه از خاکم نه ز آبم نه ازین اهل زمانم
خرد پوره آدم چه خبر دارد ازین دم که من از جمله عالم به دو صد پرده نهانم
مشنو این سخن از من و نه زین خاطر روشن که ازین ظاهر و باطن نه پذیرم نه ستانم
رخ تو گرچه که خوب است قفس جان تو چوب است برم از من که بسوزی که زبانه ست زبانم
نه ز بویم نه ز رنگم نه ز نامم نه ز ننگم حذر از تیر خدنگم که خدایی ست کمانم
نه می خام ستانم نه ز کس وام ستانم نه دم و دام ستانم هله ای بخت جوانم
چو گلستان جنانم طربستان جهانم به روان همه مردان که روان است روانم
شکرستان خیالت بر من گلشکر آرد به گلستان حقایق گل صد برگ فشانم
چو درآیم به گلستان گل افشان وصالت ز سر پا بنشانم که ز داغت بنشانم
عجب ای عشق چه جفتی چه غریبی چه شگفتی چو دهانم بگرفتی به درون رفت بیانم
چو به تبریز رسد جان سوی شمس الحق و دینم همه اسرار سخن را به نهایت برسانم
.............................................
ای قوم به حج رفته کجائید کجائید؟ معشوق همین جاست بیایید، بیایید
معشوق تو همسایه دیوار به دیوار در بادیه سرگشته شما در چه هوایید
گر صورتِ بیصورت معشوق ببینید همه خواجه و هم خانه و هم کعبه شمایید
.............................................
چه تدبیر ای مسلمانان که من خود را نمیدانم نه ترسا نه یهودیام نه گبر و نه مسلمانم
نه شرقیام نه غربیام، نه علویام نه سُفلیام نه زارکانِ طبیعیام نه از افلاکِ گردانم
نه از هندم نه از چینم نه از بلغار و مغسینم نه از ملکِ عراقینم نه از خاکِ خراسانم

جلال الدين محمد بن بهاءالدين محمد بن حسيني خطيبي بکري بلخي معروف به مولوي يا مولانای بلخی ( رومی اشتباه میباشد ) يکي از بزرگترين مشاهیر ایران و پدر عرفان جهان بشمار مي رود. خانواده وي از خاندانهاي محترم بلخ در خراسان بزرگ ایران بود و گويا نسبش به ابوبکر خليفه ميرسد و پدرش از سوي مادر دخترزاده سلطان علاءالدين محمد خوارزمشاه بود و به همين جهت به بهاءالدين ولد معروف شد.
وي در سال 604 هجري در بلخ خراسان ولادت يافت. چون پدرش از بزرگان مشايخ عصر بود و سلطان محمد خوارزمشاه با اين سلسله لطفي نداشت، بهمين علت بهاءالدين در سال 609 هجري با خانواده خد خراسان را ترک کرد. از راه بغداد به مکه رفت و از آنجا در الجزيره ساکن شد و پس از نه سال اقامت در ملاطيه (ملطيه) سلطان علاءالدين کيقباد سلجوقي که عارف مشرب بود او را به پايتخت خود شهر قونيه دعوت کرد و اين خاندان در آنجا مقيم شد. هنگام هجرت از خراسان جلال الدين پنج ساله بود و پدرش در سال 628 هجري در قونيه رحلت کرد. مولانا روحیه عرفان ایرانی و اندیشه پاک را از عطار و شمس فرا گرفت و به زیباترین شکل ممکن آن را زنده نمود و جهان را از این باور سیراب کرد .
پس از مرگ پدر مدتي در خدمت سيد برهان الدين ترمذي که از شاگردان پدرش بود و در سال 629 هجري به آن شهر آمده بود شاگردي کرد. سپس تا سال 645 هجري که شمس الدين صائب تبريزي رحلت کرد جزو مريدان و شاگردان او بود. آنگاه خود جزو پيشوايان طريقت شد و طريقه اي فراهم ساخت که پس از وي انتشار يافت و به اسم طريقه مولويه معروف شد. خانقاهي در شهر قونيه بر پا کرد و در آنجا به ارشاد مردم پرداخت. آن خانقاه کم کم بدستگاه عظيمي بدل شد و معظم ترين اساس تصوف بشمار رفت و از آن پس تا اين زمان آن خانقاه و آن سلسله در قونيه باقي است و در تمام ممالک شرق پيروان بسيار دارد. جلال الدين محمد مولوي همواره با مريدان خود ميزيست تا اينکه در پنجم جمادي الاخر سال 672 هجري رحلت کرد. وي يکي از بزرگترين شاعران ايران و يکي از مردان عالي مقام جهان است. در ميان شاعران و عارفان ايران شهرتش بپاي شهرت فردوسي، سعدي، عمر خيام و حافظ ميرسد و از اقران ايشان بشمار ميرود. آثار وي به بسياري از زبانهاي مختلف ترجمه شده است. اين عارف بزرگ در وسعت نظر و بلندي انديشه و بيان ساده و دقت در خضال انساني يکي از برگزيدگان نامي دنياي بشريت بشمار ميرود. يکي از بلندترين مقامات را در ارشاد فرزند آدمي دارد و در حقيقت او را بايد در شمار اوليا دانست. سرودن شعر تا حدي تفنن و تفريح و يک نوع لفافه اي براي اداي مقاصد عالي او بوده و اين کار را وسيله تفهيم قرار داده است. اشعار وي به دو قسمت منقسم ميشود، نخست منظومه معروف اوست که از معروف ترين کتابهاي زبان فارسي است و آنرا "مثنوي معنوي" نام نهاده است. اين کتاب که صحيح ترين و معتبرترين نسخه هاي آن شامل 25632 بيت است، به شش دفتر منقسم شده و آن را بعضي به اسم صيقل الارواح نيز ناميده اند. دفاتر شش گانه آن همه بيک سياق و مجموعه اي از افکار عرفاني و اخلاقي و سير و سلوک است که در ضمن، آيات و احکام و امثال و حکايتهاي بسيار در آن آورده است و آن را بخواهش يکي از شاگردان خود بنام حسن بن محمد بن اخي ترک معروف به حسام الدين چلبي که در سال 683 هجري رحلت کرده است به نظم درآودره. جلال الدين مولوي هنگامي که شوري و وجدي داشته، چون بسيار مجذوب سنايي و عطار نیشابوری که از عارفان بزرگ ایران بودند ، به همان وزن و سياق منظومه هاي ايشان اشعاري با کمال زبردستي بديهه ميسروده است و حسام الدين آنها را مي نوشته. نظم دفتر اول در سال 662 هجري تمام شده و در اين موقع بواسطه فوت زوجه حسام الدين ناتمام مانده و سپس در سال 664 هجري دنباله آنرا گرفته و پس از آن بقيه را سروده است. قسمت دوم اشعار او، مجموعه بسيار قطوري است شامل نزديک صدهزار بيت غزليات و رباعيات بسيار که در موارد مختلف عمر خود سروده و در پايان اغلب آن غزليات نام شمس الدين تبريزي را برده و بهمين جهت به کليات شمس تبريزي و يا کليات شمس معروف است. گاهي در غزليات خاموش و خموش تخلص کرده است و در ميان آن همه اشعار که با کمال سهولت ميسروده است، غزليات بسيار رقيق و شيوا هست که از بهترين اشعار زبان فارسي بشمار تواند آمد.
جلال الدين بلخي پسري داشته است به اسم بهاءالدين احمد معروف به سلطان ولد که جانشين پدر شده و سلسله ارشاد وي را ادامه داده است. وي از عارفان معروف قرن هشتم بشمار ميرود و مطالبي را که در مشافهات از پدر خود شنيده است در کتابي گرد آورده و "فيه مافيه" نام نهاده است. نيز منظومه اي بهمان وزن و سياق مثنوي بدست هست که به اسم دفتر هفتم مثنوي معروف شده و به او نسبت ميدهند اما از او نيست. ديگر از آثار مولانا مجموعه مکاتيب او و مجالس سبعه شامل مواعظ اوست.
هرمان اته، خاور شناس مشهور آلماني درباره جلال الدين محمد بلخي (مولوي) چنين نوشته است:
به سال ششصد و نه هجري بود که فريدالدين عطار اولين و آخرين بار حريف آينده خود که ميرفت در شهرت شاعري بزرگترين همدوش او گردد، يعني جلال الدين را که آن وقت پسري پنجساله بود در نيشابور زيارت کرد. گذشته از اينکه (اسرارنامه) را براي هدايت او به مقامات عرفاني به وي هديه نمود با يک روح نبوت عظمت جهانگير آينده او را پيشگويي کرد.
جلال الدين محمد بلخي که بعدها به عنوان جلال الدين رومي اشتهار يافت و بزرگترين شاعر عرفاني مشرق زمين و در عين حال بزرگترين سخن پرداز وحدت وجودي تمام اعصار گشت، پسر محمد بن حسين الخطيبي البکري ملقب به بهاءالدين ولد در ششم ربيع الاول سال ششصد و چهار هجري در بلخ به دنيا آمد. پدرش با خاندان حکومت وقت يعني خوارزمشاهيان خويشاوندي داشت و در دانش و واعظي شهرتي بسزا پيدا کرده بود. ولي به حکم معروفين و جلب توجه عامه که وي در نتيجه دعوت مردم بسوي عالمي بالاتر و جهان بيني و مردم شناسي برتري کسب نمود. محسود سلطان علاءالدين خوارزمشاه گرديد و مجبور شد بهمراهي پسرش که از کودکي استعداد و هوش و ذکاوت نشان ميداد قرار خود را در فرار جويد و هر دو از طريق نيشابور که در آنجا به زيارت عطار نايل آمدند و از راه بغداد اول به زيارت مکه مشرف شدند و از آنجا به شهر ملطيه رفتـند. در آنجا مدت چهار سال اقامت گزيدند؛ بعد به لارنده انتقال يافتند و مدت هفت سال در آن شهر ماندند. در آنجا بود که جلال الدين تحت ارشاد پدرش در دين و دانش مقاماتي را پيمود و براي جانشيني پدر در پند و ارشاد کسب استحقاق نمود. در اين موقع پدر و فرزند بموجب دعوتي که از طرف سلطان علاءالدين کيقباد از سلجوقيان روم از آنان بعمل آمد به شهر قونيه که مقر حکومت سلطان بود عزيمت نمود و در آنجا بهاءالدين در تاريخ هيجدهم ربيع الثاني سال ششصد و بيست و هشت هجري وفات يافت.
جلال الدين از علوم ظاهري که تحصيل کرده بود خسته گشت و با جدي تمام دل در راه تحصيل مقام علم عرفان نهاد و در ابتداء در خدمت يکي از شاگردان پدرش يعني برهان الدين ترمذي که 629 هجري به قونيه آمده بود تلمذ نمود. بعد تحت ارشاد درويش قلندري بنام شمس الدين تبريزي درآمد واز سال 642 تا 645 در مفاوضه او بود. شمس الدين با نبوغ معجره آساي خود چنان تأثيري در روان و ذوق جلال الدين اجرا کرد که وي به سپاس و ياد مرشدش در همه غزليات خود بجاي نام خويشتن نام شمس تبريزي را بکار برد. هم چنين غيبت ناگهاني شمس، در نتيجه قيام عوام و خصومت آنها با علوي طلبي وي که در کوچه و بازار قونيه غوغائي راه انداختند و در آن معرکه پسر ارشد خود جلال الدين يعني علاءالدين هم مقتول گشت. مرگ علاءالدين تأثيري عميق در دلش گذاشت و او براي يافتن تسليت و جستن راه تسليم در مقابل مشيعت، طريقت جديد سلسله مولوي را ايجاد نمود که آن طريقت تا کنون ادامه دارد و مرشدان آن همواره از خاندان خود جلال الدين انتخاب مي گردند. علائم خاص پيروان اين طريقت عبارتست در ظاهر از کسوهً عزا که بر تن مي کنند و در باطن از حال دعا و جذبه و رقص جمعي عرفاني يا سماع که بر پا ميدارند و واضع آن خود مولانا هست. و آن رقص همانا رمزيست از حرکات دوري افلاک و از رواني که مست عشق الهي است. و خود مولانا چون از حرکات موزون اين رقص جمعي مشتعل ميشد و از شوق راه بردن به اسرار وحدت الهي سرشار مي گشت؛ آن شکوفه هاي بي شمار غزليات مفيد عرفاني را ميساخت که به انظمام تعدادي ترجيع بند و رباعي ديوان بزرگ او را تشکيل ميدهد. بعضي از اشعار آن از لحاظ معني و زيبايي زبان و موزونيت ابيات جواهر گرانبهاي ادبيات جهان محسوب ميشود.
اثر مهم ديگر مولانا که نيز پر از معاني دقيق و داراي محسنات شعري درجه اول است، همانا شاهکار او کتاب مثنوي يا به عبارت کامل تر "مثنوي معنوي" است. در اين کتاب که شايد گاهي معاني مشابه تکرار شده و بيان عقايد صوفيان بطول و تفضيل کشيده و از اين حيث موجب خستگي خواننده گشته است. آنچه به زيبايي و جانداري اين کتاب اين کتاب مي افزايد، همانا سنن و افسانه ها و قصه هاي نغز و پر مغزيست که نقل گشته. الهام کنند مثنوي شاگرد محبوب او "چلبي حسام الدين" بود که اسم واقعي او حسن بن محمد بن اخي ترک، است. مشاراليه در نتيجه مرگ خليفه (صلاح الدين زرکوب) که بعد از تاريخ 657 هجري اتفاق افتاد، بجاي وي بجانشيني مولانا برگزيده شد و پس از وفات استاد مدت ده سال بهمين سمت مشغول ارشاد بود تا اينکه خودش هم به سال 683 هجري درگذشت. وي با کمال مسرت مشاهده نمود که مطالعه مثنوي هاي سنائي و عطار تا چه اندازه در حال جلال الدين جوان ثمر بخش است. پس او را تشويق و ترغيب به نظم کتاب مثنوي کرد و استاد در پيروي از اين راهنمايي حسام الدين دفتر اول مثنوي را بر طبق تلقين وي برشته نظم کشيد و بعد بواسطه مرگ همسر حسام الدين ادامه آن دو سال وقفه برداشت. ولي به سال 662 هجري استاد بار ديگر بکار سرودن مثنوي پرداخت و از دفتر دوم آغاز نمود و در مدت ده سال منظومه بزرگ خود را در شش دفتر به پايان برد.
بهترين شرح حال جلال الدين و پدر و استادان و دوستانش در کتاب مناقب العارفين تأليف شمس الدين احمد افلاکي يافت ميشود. وي از شاگردان جلال الدين چلبي عارف، نوهً مولانا متوفي سال 710 هجري بود. همچين خاطرات ارزش داري از زندگي مولانا در "مثنوي ولد" مندرج است که در سال 690 هجري تأليف يافته و تفسير شاعرانه ايست از مثنوي معنوي. مؤلف آن سلطان ولد فرزند مولاناست، و او به سال 623 هجري در لارنده متولد شد و در سال 683 هجري به جاي مرشد خود حسام الدين بمسند ارشاد نشست و در ماه رجب سال 712 هجري درگذشت. نيز از همين شخص يک مثنوي عرفاني بنام "ربابنامه" در دست است.»
از شروح معروف مثنوي در قرنهاي اخير از شرح مثنوي حاج ملا هادي سبزواري و شرح مثنوي شادروان استاد بديع الزمان فروزانفر که متأسفانه بعلت مرگ نابهنگام وي ناتمام مانده و فقط سه مجلد مربوط به دفتر نخست مثنوي چاپ و منتشر شده است. و همچنين شرح مثنوي علامه محمد تقي جعفري تبريزي بايد نام برد. عابدين پاشا در شرح مثنوي اين دو بيت را به جامي نسبت داده که درباره جلال الدين رومي و کتاب مثنوي سروده:
آن فـريــدون جــهـــان مــعــنـــوي بس بود برهان ذاتش مثنوي
من چه گويم وصف آن عالي جناب نيست پيغمبر ولي دارد کتاب
شيخ بهاءالدين
عاملي عارف و شاعر و نويسنده مشهور قرن دهم و يازدهم هجري درباره مثنوي معنوي مولوي چنين سروده است:
من نمي گويم که آن عالي جناب هست پيغمبر، ولي دارد کتاب
مـثــنــوي او چــو قــرآن مــــدل هادي بعضي و بعضي را مذل
ميگويند روزي اتابک ابي بکر بن سعد زنگي از سعدي مي پرسيد: "بهترين و عالي ترين غزل زبان فارسي کدام است؟"، سعدي در جواب يکي از غزلهاي جلال الدين محمد بلخي (مولوي) را ميخواند که مطلعش اين است:
هر نفس آواز عشق ميرسد از چپ و راست ما بفلک ميرويم عزم تماشا کراست
اکنون چند بيت از مثنوي معنوي مولوي شاهکار بزرگ عرفانی جهان به عنوان تبرک درج ميشود:
يـار مـرا , غار مـرا , عشق جگر خـوار مـرا يـار تـوئی , غار تـوئی , خواجه نگهدار مـرا
نوح تـوئی , روح تـوئی , فاتح و مفتوح تـوئی سينه مشروح تـوی , بر در اسرار مـرا
نـور تـوئی , سـور تـوئی , دولت منصور تـوئی مرغ کــه طور تـوئی , خسته به منقار مـرا
قطره توئی , بحر توئی , لطف توئی , قهر تـوئی قند تـوئی , زهر تـوئی , بيش ميازار مـرا
حجره خورشيد تـوئی , خانـه ناهيـد تـوئی روضه اوميد تـوئی , راه ده ای يار مـرا
روز تـوئی , روزه تـوئی , حاصل در يـوزه تـوئی آب تـوئی , کوزه تـوئی , آب ده اين بار مـرا
دانه تـوئی , دام تـوی , باده تـوئی , جام تـوئی پخته تـوئی , خام تـوئی , خام بمـگذار مـرا
اين تن اگر کم تندی , راه دلم کم زنـدی راه شـدی تا نبـدی , اين همه گفتار مـرا
مرده بدم زنده شدم ، گريه بدم خنده شدم دولت عشق آمد و من دولت پاينده شدم
ديده سيرست مرا ، جان دليرست مرا زهره شيرست مرا ، زهره تابنده شدم
گفــت که : ديوانه نه ، لايق اين خانه نه رفتم و ديوانه شدم سلسله بندنده شدم
گفــت که : سرمست نه ، رو که از اين دست نه رفتم و سرمست شدم و ز طرب آکنده شدم
گفــت که : تو کشته نه ، در طرب آغشته نه پيش رخ زنده کنش کشته و افکنده شدم
گفــت که : تو زير ککی ، مست خيالی و شکی گول شدم ، هول شدم ، وز همه بر کنده شدم
گفــت که : تو شمع شدی ، قبله اين جمع شدی جمع نيم ، شمع نيم ، دود پراکنده شدم
گفــت که : شيخی و سری ، پيش رو و راه بری شيخ نيم ، پيش نيم ، امر ترا بنده شدم
گفــت که : با بال و پری ، من پر و بالت ندهم در هوس بال و پرش بی پر و پرکنده شدم
گفت مرا دولت نو ، راه مرو رنجه مشو زانک من از لطف و کرم سوی تو آينده شدم
گفت مرا عشق کهن ، از بر ما نقل مکن گفتم آری نکنم ، ساکن و باشنده شدم
چشمه خورشيد توئی ، سايه گه بيد منم چونک زدی بر سر من پست و گدازنده شدم
تابش جان يافت دلم ، وا شد و بشکافت دلم اطلس نو بافت دلم ، دشمن اين ژنده شدم
صورت جان وقت سحر ، لاف همی زد ز بطر بنده و خربنده بدم ، شاه و خداونده شدم
شکر کند کاغذ تو از شکر بی حد تو کامد او در بر من ، با وی ماننده شدم
شکر کند خاک دژم ، از فلک و چرخ بخم کز نظر و گردش او نور پذيرنده شدم
شکر کند چرخ فلک ، از ملک و ملک و ملک کز کرم و بخشش او روشن و بخشنده شدم
شکر کند عارف حق کز همه بر ديم سبق بر زبر هفت طبق ، اختر رخشنده شدم
زهره بدم ماه شدم چرخ دو صد تاه شدم يوسف بودم ز کنون يوسف زاينده شدم
از توا م ای شهره قمر ، در من و در خود بنگر کز اثر خنده تو گلشن خندنده شدم
باش چو شطرنج روان خامش و خود جمله زبان کز رخ آن شاه جهان فرخ و فرخنده شدم
ای عاشقان , ای عاشقان من خاک را گوهر کنم وی مطربان , وی مطربان دف شما پر زر کنم
باز آمدم , باز آمدم , از پيش آن يار آمدم در من نگر , در من نگر , بهر تو غمخوار آمدم
شاد آمدم , شاد آمدم , از جمله آزاد آمدم چندين هزاران سال شد تا من بگفتار آمدم
آنجا روم , آنجا روم , بالا بدم بالا روم بازم رهان , بازم رهان کاينجا بزنهار آمدم
من مرغ لاهوتی بدم , ديدی که ناسوتی شدم دامش نديدم ناگهان در وی گرفتار آمدم
من نور پاکم ای پسر , نه مشت خاکم مختصر آخر صدف من نيستم , من در شهوار آمدم
ما را بچشم سر مبين , ما را بچشم سر ببين آنجا بيا , ما را ببين کاينجا سبکسار آمدم
از چار مادر برترم وز هفت آبا نيز هم من گوهر کانی بدم کاينجا بديدار آمدم
يارم به بازار آمدست , چالاک و هشيار آمدست ورنه ببازارم چه کار ويرا طلب کار آمدم
ای شمس تبريزی , نظر در کل عالم کی کنی کندر بيابان فنا جان و دل افکار آمدم
اندک اندک جمع مستان می رسنـــد اندک اندک می پرستان می رسنـــد
دلنوازان ناز نازان در ره اند گلعذاران از گلستان می رسنـــد
اندک اندک زين جهان هست و نيست نيستان رفتند و هستان می رسنـــد
جمله دامنهای پر زر همچو کان از برای تنگ دستان می رسنـــد
لاغران خسته از مرعای عشــق فربهان و تندرستان می رسنـــد
جان پاکان چون شعاع آفتــاب از چنان بالا بپستان می رسنـــد
خرم آن باغی که بهر مريــمان ميوه های نو ز مستان می رسنـــد
اصلشان لطفست و هم واگشت لطف هم ز بستان سوی بستان می رسنـــد
دل من کار تــو دارد , گل گلنار تــو دارد چه نکوبخت درختی که برو بار تــو دارد
چه کند چرخ فلک را ؟ چه کند عالم شک را ؟ چو بر آن چرخ معانی مهش انوار تــو دارد
بخدا ديو ملامـت برهد روز قيامت اگر او مهر تــو دارد , اگر اقرار تــو دارد
بخدا حور و فرشته , بدو صد نور سرشته نبرد سر , نپرد جان , اگر انکار تــو دارد
تو کيی ؟ آنک ز خاکی تو و من سازی و گويی نه چنان ساختمت من که کس انکار تــو دارد
ز بلا های معظم نخورد غم , نخورد غم دل منصور حلاجی , که سر دار تــو دارد
چو ملک کوفت دمامه بنه ای عقل عمامه تو مپندار که آن مه غم دستار تــو دارد
بمر ای خواجه زمانی , مگشا هيچ دکانی تو مپندار که روزی همه بازار تــو دارد
تو از آن روز که زادی هدف نعمت و دادی نه کليد در روزی دل طرار تــو دارد
بن هر بيح و گياهی خورد رزق الهی همه وسواس و عقيله دل بيمار تــو دارد
طمع روزی جان کن, سوی فردوس کشان کن که ز هر برگ و نباتش شکر انبار تــو دارد
نه کدوی سر هر کس می راوق تــو دارد نه هران دست که خارد گل بی خار تــو دارد
چو کدو پاک بشويد ز کدو باده برويد که سر و سينه پاکان می از آثار تــو دارد
خمش ای بلبل جانها که غبارست زبانها که دل و جان سخنها نظر يار تــو دارد
بنما شمس حقايق تو ز تبريز مشارق که مه و شمس و عطارد غم ديدار تــو دارد
شمس و قمرم آمد , سمع و بصرم آمد وان سيم برم آمد وان کان زرم آمد
مستی سرم آمد نور نظرم آمد چيز دگر ار خواهی چيز دگرم آمد
آن راه زنم آمد , توبه شکنم آمد وان يوسف سيمين بر , ناگه ببرم آمد
امروز به از دينه , ای مونس ديرينه دی مست بدان بودم , کز وی خبرم آمد
آنکس که همی جستم , دی من بچراغ او را امروز چو تنگ گل , بر رهگذرم آمد
دو دست کمر کرد او , بگرفت مرا در بر زان تاج نکورويان نادر کمرم آمد
آن باغ و بهارش بين , وان خمر خمارش بين وان هضم و گوارش بين چون گلشکرم آمد
از مرگ چرا ترسم کو آب حيات آمد وز طعنه چرا ترسم چون او سپرم آمد
امروز سليمانم کانگشتريم دادی وان تاج ملوکانه بر فرق سرم آمد
از حد چو بشد دردم در عشق سفر کردم يارب چه سعادتها که زين سفرم آمد
وقتست که می نوشم تا برق زند هوشم وقتست که بر پرم چون بال و پرم آمد
وقتست که در تابم چون صبح درين عالم وقتست که بر غرم چون شير نرم آمد
بيتی دو بماند اما , بردند مرا , جانا جايی که جهان آنجا بس مختصرم آمد
عبدالرحمن جامي مينويسد:
بخط مولانا بهاءالدين ولد نوشته يافته اند که جلال الدين محمد در شهر بلخ شش ساله بوده که روز آدينه با چند کودک ديگر بر بامهاي خانه هاي ما سير ميکردند. يکي از آن کودکان با ديگري گفته باشد که بيا تا از اين بام بر آن بام بجهيم. جلال الدين محمد گفته است: اين نوع حرکت از سگ و گربه و جانوارن ديگر مي آيد، حيف باشد که آدمي به اينها مشغول شود، اگر در جان شما قوتي هست بيائيد تا سوي آسمان بپريم. و در آن حال ساعتي از نظر کودکان غايب شد، فرياد برآوردند، بعد از لحظه اي رنگ وي ديگرگون شده و چشمش متغير شده باز آمد و گفت: آن ساعت که با شما سخن مي گفتم ديدم که جماعتي سبز قبايان مرا از ميان شما برگرفتند و بگرد آسمان ها گردانيدند و عجايب ملکوت را به من نمودند؛ و چون آواز فرياد و فغان شما برآمد بازم به اين جايگاه فرود آوردند .
و گويند که در آن سن در هر سه چهار روز يکبار افطار مي کرد. و گويند که در آن وقت که (همراه پدر خود بهاءالدين ولد) به مکه رفته اند در نيشابور به صحبت شيخ فريد الدين عطار رسيده بود و شيخ کتاب اسرارنامه به وي داده بود و آن پيوسته با خود مي داشت.....
فرموده است که: مرغي از زمين بالا پرد اگر چه به آسمان نرسد اما اينقدر باشد که از دام دورتر باشد و برهد، و همچنين اگر کسي درويش شود و به کمال درويشي نرسد، اما اينقدر باشد که از زمره خلق و اهل بازار ممتاز باشد و از زحمتهاي دنيا برهد و سبکبار گردد.....
يکي از اصحاب را غمناک ديد، فرمود همه دل تنگي از دل نهادگي بر اين عالم است. مردي آنست که آزاد باشي از اين جهان و خود را غريب داني و در هر رنگي که بنگري و هر مزه يي که بچشي داني که به آن نماني و جاي ديگر روي هيچ دلتنگ نباشي. و فرموده است که آزاد مرد آن است که از رنجانيدن کس نرنجد، و جوانمرد آن باشد که مستحق رنجانيدن را نرنجاند.
مولانا سراج الدين قونيوي صاحب صدر و بزرگ وقت بوده، اما با خدمت مولوي خوش نبوده. پيش وي تقرير کردند که مولانا گفته است که من با هفتاد و سه مذهب يکي ام؛ چون صاحب غرض بود خواست که مولانا را برنجاند و بي حرمتي کند. يکي را از نزديکان خود که دانشمند بزرگ بود فرستاد که بر سر جمعي از مولانا بپرس که تو چنين گــفـته اي؟ اگر اقرار کند او را دشنام بسيار بده و برنجان. آن کس بيامد و بر مولانا سؤال کرد که شما چنين گفته ايد که من با هفتاد و سه مذهب يکي ام؟! گفت: گفته ام. آن کس زبان بگشاد و دشنام و سفاهت آغاز کرد، مولانا بخنديد و گفت: با اين نيز که تو مي گويي هم يکي ام. آنکس خجل شده و باز گشت. شيخ رکن الدين علاءالدوله سمناني گفته است که مرا اين سخن از وي به غايت خوش آمده است.
از وي پرسيدند که درويش کي گناه کند؟ گفت: مگر طعام بي اشتها خورد که طعام بي اشتها خوردن، درويش را گناهي عظيم است. و گفته که در اين معني حضرت خداوندم شمس الدين تبريزي قدس سره فرمود که علامت مريد قبول يافته آنست که اصلا با مردم بيگانه صحبت نتواند داشتن و اگر ناگاه در صحبت بيگانه افتد چنان نشيند که منافق در مسجد و کودک در مکتب و اسير در زندان.
و در مرض اخير با اصحاب گفته است که: از رفتن من غمناک مشويد که نور منصور رحمهالله تعالي بعد از صد و پنجاه سال بر روح شيخ فريدالدين عطار رحمةالله تجلي کرد و مرشد او شد، و گفت در هر حالتي که باشيد با من باشيد و مرا ياد کنيد تا من شما را ممد و معاون باشم در هر لباسي که باشم.
تندیس مولانا جلال الدین محمد بلخی در شهر اهواز
آرامگاه مولانا جلال الدین محمد بلخی در قونیه - ترکیه
فرجام سخن
در پایان باید متذکر شد که جهان از دیدگاه بزرگ مولانا به شگفت آمده است و به همین جهت یونسکو سال 2007 را نیز به نام مولانا بلخی نام گذاری نموده است . سال 2003 نیز سال زرتشت فیلسوف نام گذاری شده بود . غرب به درستی می داند که ایران زادگاه فرهنگ و تمدن جهان است ولی از عنوان درست آن خودداری می نماید . ساخت فیلم موهن 300 آمریکا یا اسکندر ملعون و جعل نام خلیج فارس توسط انگلستان و آمریکا و اعراب و ادعای اعراب برای جزایر سه گانه ایران و برپایی نمایشگاه دروغین امپراتوری شیطانی ایران توسط انگلستان و . . . از این موارد متجاوزانه در جهت تغییر چهره تمدن ایران بر پایه دروغ است . یکی از معضلات فرهنگی کنونی ایران زمین سرقت مشاهیر و فرهنگ و تمدن ماست . شاید کوتاهی و سهل انگاری ما مهم ترین عامل چنین وقایعی باشد . ترکیه کشور همسایه ایران و به عبارتی امپراتوری متلاشی شده و متجاوز عثمانی که بارها کشور ما را مورد تاخت و تاز قرار داد , امروز دست بر روی این عارف بزرگ ایرانی گذاشته است و مولانای بلخی را به دلیل آنکه در قونیه ترکیه وفات یافته است از مشاهیر ترک می خواند ! جای بسی شگرفی و کوته فکری است که حتی 1% بخواهیم مولانا را ترک نژاد از ملت عثمانی ها بخوانیم . زادگاه هر فرد معرف ملیت اوست . در ثانی مولانا کتابش را نیز به پارسی برای جهان باقی گذاشت و مایه تاسف است که کسانی بخواهند برای کشور مجهول الهویه خود که حتی تا پیش از عثمانی ها یکی از ایالات ایران بوده است امروز دست به سرقت فرهنگی و بزرگان ایران بزند . الگوی رفتاری مولانا همگی هم مینهانش منجمله عطار نیشابوری بوده اند و هیچ سنخیتی با ترکان عثمانی وجود ندارد . درست مانند این است که شخصی برای زندگی از ایران به کشور دیگری برود و پس از مدتی آنجا بدرود حیات بگوید و در پایان وی را از آن سرزمین بخوانند ! به هر روی این حرکات بی ثمر هیچ نتیجه ای به جز نشان دادن ماهیت پوچ این کشورها ندارد . درست مانند اعراب که ابوریحان بیرونی و ابن سینا ایران را از مشاهیر عرب خوانده اند ! آری ما از ملت دون پایه و بدوی عرب انتظاری بیش از این نداریم و اگر ترکان عثمانی نیز بخواهند از تازیان پیروی کنند و برای خود ماهیت دروغین بسازند ملت ایران پاسخ آنان را خواهند داد . متاسفانه برخی از برداران تاریخی و خونی ما در افغانستان دست به چنین جعلی زده اند و مولانا را از مشاهیر افغانستان معرفی کرده اند ولی گویا این افراد نمیدانند در روزگار مولانا کشوری به نام افغانستان در هیچ کجای گیتی وجود نداشته است ؟ افغانستان بخشی از خراسان بزرگ ایران بوده است و همگی بخشی از ملت ایران محسوب میشده ایم . تخارستان - بدخشان و بامیان و . . . همگی بخشی از خراسان بوده اند که متاسفانه با نیرنگ های روس و انگلیس تبدیل به کشوری به نام افغانستان می شوند وگرنه ما همگی بخشی از ملت آریایی ایران هستیم . خود مولانا نیز در نوشته هایش میگوید که ما از اندیشه های دگر بزرگان ایران همچون عطار و سنائی به چنین مقامی رسیدیم :
من آن مولاي رومي ام که از نطقم شکر ريزد وليکن در سخن گفتن غلام شيخ عطارم
آنچه گفتم از حقيقت اي عزيز آن شنيدستم هم از عطار نيز
عطار شيخ ما و سنائيست پيشرو ما از پس سنائي و عطار آمديم
شوربختانه برخی از دستگاه های تبلیغاتی ضد ایرانی بر طبل "مولانای رومی" میکوبند . مولانا بلخی بوده است و مهاجرت به کشوری دیگر دلیل رومی بودن وی نیست . به هر روی بزرگان هر سرزمینی تا ابد جزوی از فرهنگ و تمدن آن سرزمین هستند و با چنین حرکات عوام فریبانه و مضحکی ریشه و تمدن کشوری بزرگ مانند ایران هرگز تغییر نخواهد کرد . شایسته است برای مقابله با این هجمه ضد ایرانی بیگانگان - دول وقت ایران با هر اندیشه و باوری که هستند با تمام قدرت با این حرکات مبارزه فرهنگی کنند . ایجاد دانشگاه با نام مولانای بلخی , فرهنگستان , بنیاد ها و حتی نامه به سازمانهای جهانی برای یادآوری ایرانی بودن مولانا و برخورد با جاعلین این سرقت فرهنگی یکی از این راهکارهاست تا ملت ایران با فراموشی این بزرگان راه را برای متجاوزان فرهنگ و تمدن ایران نگشایند .
پایگاه های اینترنتی وابسته به مولانا عارف بزرگ ایرانی:
| مرزهای جغرافیایی ایران بزرگ | سالهای تقریبی از حکومتهای ایران | توضیحات نقشه |
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--- | نقشه گستره جغرافیایی فلات ایران زمین |
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--- | نقشه گستره ایران بزرگ در طول تاریخ |
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در حدود 650 پیش از میلاد |
امپراتوری ایرانی ماد . پیش از ظهور هخامنشیان |
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در حدود 600 پیش از میلاد |
امپراتوری ماد ایران در اوج قدرت - مادها یکی از تیره های کهن ایرانی هستند که دو بخش می شوند ماد خرد یا کوچک - ماد بزرگ . ماد بزرگ نژاد آریایی ایران است که در عراق پیش از اسلام ایرانیان آنجا زندگی میکرده اند و شامل کردها و فارسها می شده است . ماد خرد یا کوچک شامل آران و شیروان و قفقاز و ارمنستان و آذربایجان می شود |
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در حدود 600 پیش از میلاد |
ایران - مرزهای بنفش پارتهای آریایی ایران ( خراسان بزرگ شامل خراسان کنونی - افغانستان - پاکستان - ازبکستان - تاجیکستان - قزاقستان ) - مرزهای زرد پارسهای آریایی ایران ( پارسه - کرمان - سیستان و بلوچستان - خوزستان ) - مرزهای سبز مادهای آریایی ایران( کردستان ترکیه - کردستان ایران - کردستان - سوریه - آذربایجان - جمهوری جعلی آذربایجان یا آران - ارمنستان - ترکیه - عراق و . . . ) که با متحد شدن و تشکیل یک حکومت واحد بزرگ ترین امپراتوری تاریخ پیش از اسلام را شکل دادند |
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سال 540 پیش از میلاد به بعد |
نقشه امپراتوری کوروش بزرگ و داریوش بزرگ در ایران |
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سالهای 560 تا 522 پیش از میلاد مسیح |
نقشه امپراتوری ایران در زمان کوروش بزرگ و فرزندش کمبوجیه |
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کوروش بزرگ شاه شاهان 559 تا 528 ق م |
نقشه ایران باستان قبل از به پادشاهی رسیدن داریوش بزرگ هخامنشی |
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کوروش بزرگ شاه شاهان 559 تا 528 ق م |
نقشه سرزمینهای آریایی امپراتوری ایران بزرک در زمان کوروش کبیر |
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490 ق م |
نقشه ایران باستان در زمان داریوش بزرگ با در نظر گرفتن کنترل ایران بر سواحل عربستان |
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داریوش بزرگ شاه شاهان 522 تا 486 ق م |
امپراتوری ایران بزرگ در زمان داریوش کبیر و فرزندش خشیارشاه |
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خشیارشا یا خشایارشاه 486 تا 465 ق م |
نقشه لشگر کشی بزرگ تاریخ توسط ایرانیان به خاک اروپا در زمان شاهنشاهی خشایارشا |
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داریوش بزرگ شاه شاهان 522 تا 486 ق م | نقشه راه شاهی ایران در خاورمیانه که توسط داریوش بزرگ پایه گذاری شد . این راه از راهای مشهور جهان باستان است که از دیدگاه تجاری - نظامی و کشوری از مهم ترین راههای جهان باستان است که توسط داریوش بزرگ هخامنشی بنا گشت |
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موقعیت جغرافیایی آتشکده های فلات ایران |
موقعیت شماتیک از آتشکده های امپراطوری ایران در زمانهای هخامنشیان و پارتیان و ساسانیان |
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کوروش بزرگ شاه شاهان 559 تا 528 ق م |
نقشه متحد شدن سه تیره کهن ایرانی آریایی پارت و پارس و ماد و تشکیل امپراطوری هخامنشی |
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کوروش بزرگ شاه شاهان 559 تا 528 ق م |
نقشه سرزمینهای امپراتوری ایران از سال 559 تا 424 قبل از میلاد |
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520 - 420 ق م |
نقشه امپراتوری ایران هخامنشی با رعایت حقوق هر کشور و احترام به ادیان آنان |
| 559 - 330 ق م |
متحد شدن تیره های آریایی پارس و پارت و ماد | |
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465 تا 358 | ایران بزرگ در زمان اردشیر یا ارتخشر اول و دوم هخامنشی |
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کوروش بزرگ شاه شاهان 559 تا 528 ق م |
نقشه ایران باستان تا شاهنشاهی اردشیر درازدست هخامنشی |
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سالهای 250 قبل از میلاد تا اوایل میلاد مسیح |
نقشه امپراتوری ایران در زمان شاهنشاهان پارتی |
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سالهای 100 پس از میلاد |
نقشه امپراتوری ایران در زمان شاهنشاهان پارتی |
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نقشه ایران در دوره پارتیان متشکل از مادها ( کردها و آذری ها ) پارتها و پارسها | |
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حدود سال 190 پس از میلاد |
نقشه امپراتوری ایران در پایان سلسله پارتیان |
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حدود 230 پس از میلاد |
نقشه ایران در زمان ساسانیان
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226 پس از میلاد تا 635 پس از میلاد |
نقشه ایران در زمان شاهنشاهی ساسانیان |
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226 پس از میلاد تا 635 پس از میلاد |
نقشه ایران در زمان شاهنشاهی ساسانیان |
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گستره هزاران سالهای سرزمینهای ایرانی |
نقشه ای از ایران بزرگ که فلات ایران بخشی از آن بوده است |
| نقشه های پس از اسلام در حال پژوهش می باشد |
نقشه ایران در زمان حکومت سامانیان پس از اسلام | |
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435 - 316 هجری قمری | نقشه ایران در زمان آل زیار |
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نقشه های پس از اسلام در حال پژوهش می باشد | نقشه های پس از اسلام در حال پژوهش می باشد |
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حدود 400 هجری | نقشه ایران پس از اسلام از دید مورخین عرب |
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نقشه های پس از اسلام در حال پژوهش می باشد | نقشه های پس از اسلام در حال پژوهش می باشد |
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سالهای ۴۵۵-۴۶۵هجری |
ایران در اوج قدرت سلجوقیان |
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نقشه های پس از اسلام در حال پژوهش می باشد |
نقشه ایران پیش از حمله عثمانیان به ایران و اشغال شهرهای کرد نشین ایران و سپس تقسیم بین ترکیه و سوریه و عراق |
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1039 خورشیدی | ایران بزرگ در زمان سلسله قدرتمند صفویان |
| نقشه های پس از اسلام در حال پژوهش می باشد | نقشه ایران در روزگار نادر شاه بزرگ شامل همه اقوام و سرزمینهای ایرانی : ترکمستان - جمهوری آذربایجان- ارمنستان - گرجستان - افغانستان - پاکستان - قطر - کویت - بحرین و . . . موجود در موزه نادرشاه بزرگ | |
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نقشه های پس از اسلام در حال پژوهش می باشد |
نقشه ایران پیش از حکومت ننگین قاجار شامل سرزمینهای شمالی ایران - قفقاز |
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1187 خورشیدی برابر با 1808 میلادی | نقشه ایران در آغاز حکومت ننگین قاجار شامل بلوچستان پاکستان - نیمی از افغانستان - جنوب ازبکستان و ترکمنستان - آذربایجان - ارمنستان - گرجستان - کردستان عراق و ترکیه |
گاهشماری در ایران باستان
تقویم ایرانیان در گذر تاریخ
مطالعه تاریخ ایران باستان و تحقیقات اخیر در این زمینه نشان میدهد که انواع تقویم رسمی و محلی از روزگاران پیشین در ایران کهن معمول بوده است که از میان آنها سه تقویم زیر دارای اهمیت بیشتری بوده است :
فرس قدیم ( هخامنشی )
اوستایی قدیم
مجوس و مغان
تقویم هخامنشی :
تقویم رایج در اوایل حکومت شاهنشاهی هخامنشیان به نام فرس قدیم یا فرس هخامنشی معروف بوده است . متون کتیبه های باقی مانده از داریوش بزرگ در کوه بیستون در کرمانشاهان و سایر فرمانهای شاهان هخامنشی ما را از تقویم رسمی امپراتوری سترگ ایران زمین و چگونگی اصول زمان سنجی در آن روزگاران آگاه میسازد . متون این کتیبه ها و محتوای فرمانها بیانگر این حقیقت اند که ایرانیان قدیم سال را به دوازده ماه تقسیم میکردند و فصول را می شناختند . ماه های هخامنشی و معنای برخی از آنها عبارت است از :
ادوکن ئیش : هنگام کندن جوی , برابر با فروردین
ثور واهر : بهار پر غرور , برابر با اردیبهشت
تائی گرچی : سیر چیدن , برابر با خورداد
گرم پد : پای گرم , برابر با تیر
درن باجی : جاودانگی , برابر با امرداد
کاریاشیا : برابر با شهریور
بایگا دئیس : ماه پرستش خدا , برابر با مهر ماه
ورگزن : برابر با آبان ماه
اثری یادی : ماه پرستش آتش : برابر با آذر ماه
آنامک : ماه خدای بی نام , برابر با دی
سامیا : برابر با بهمن ماه
ویخن : برابر با اسفند ماه
در اخبار است که داریوش بزرگ دو نفر از منجمان نامدار کلدانی با به نام "نبوریمنو" , "کیدینوس" را جهت اصلاح این تقویم به ایران دعوت کرد و ایشان با آشنایی به دانش نجوم یک سال شمسی را برابر با 365 روز و 6 ساعت و 15 دقیقه و 41 ثانیه معین نمود . به احتمال قوی سال و ماه ایرانیان را با اصول سال و ماه بابلی تنظیم کردند . این تقویم که قدیمیترین نمونه زمان سنجی در ایران است , تا زمانی که تقویم اوستایی در ایران رواج یابد تقویم رسمی کشور بوده است . خصوصیات آن به شرح زیر است :
1 ) آغاز سال : در تقویم فرس قدیم آغاز سال با آغاز پاییز مقارن و اولین ماه سال "باکیادئیس" با برگزاری جشن "باگایادی" توام بود . همچنین از قرار معلوم جشن مهرگان بعد از برقراری تقویم زرتشتی به جای جشن باگایادی برگزار می شده است .
2 ) مبدا و سرآغاز : در خصوص اینکه سرآغاز تقویم فرس قدیم از چه زمانی و متکی بر چه واقعه ای بوده است , اطلاع دقیقی در دست نیست . ولی بر اساس قرائن میتوان گفت : چون آغاز سلطنت هر پادشاهی , مبدا تاریخی آن زمان محسوب میشده و در دولت بابل نیز چنین میکردند پس مادها و پارسها که چیزهای زیادی را از بابل و آشور اخذ و اقتباس کرده بودند , به احتمال زیاد این امر نیز از آنان گرفته شده است . همچنان که متون گلی پارسه ( تخت جمشید ) این احتمال را مقرون به حقیقت ساخته است .
3 ) شمارش ایام : در تقویم فرس قدیم , مانند عصر حاضر , روزهای هر ماه را با شمارش اعداد مشخص میکردند و هر ماه دارای 30 روز بوده است . نمونه آن را در کتیبه بیستون میخوانیم :
چهارده روز از ماه ویخن گذشته بود که . . .
نه روز از ماه گرم پد گذشته بود که . . .
4 ) فصل : در تقویم فرس قدیم , سال به چهار فصل سه ماهه تقسیم می شد و به کاربردن کلماتی همچون وهار به جای بهار و وهامین به جای تابستان و پاتیژ به جای پاییز که در زبان پهلوی معمول بوده مبین همین امر است . این واژه های باستانی امروزه در زبان کردی به راحتی قابل مشاهده است . کردهای ایرانی نژاد هنوز این واژه ها را حفظ کرده اند و به بهار امروزی همان وه هار میگویند یا به تابستان پارسی امروزی همان واژه پهلوی ایران باستان یعنی هاوین را به کار می برند .
تقویم دینی مزدیسنا :
بعد از پادشاهی داریوش بزرگ تقویم مزدیسنا در ایران رواج یافت و ماههای زرتشتی جانشین ماهای فرس هخامنشی گردید . این تقویم در تاریخ ایران به تقویم دینی مزدیسنا یعنی تقویم زرتشتی و یا تقویم اوستایی که بعدها تقویم یزدگردی شد مشهور است . این تقویم کاملا مذهبی است و بر اساس خواسته های دینی زرتشتیان و بر اساس انجام مراسم و فرایض دینی آنان بنا شد . به طوریکه هر یک از روزها و ماههای سال به فرشته یا فرشتگانی اختصاص دارد و انجام فرایض دینی را در زمانهای خاص توصیه مینماید . برخی از خصویات این تقویم از این قرار است :
شبانه روز در تقویم مزدیسنا :
در اوستا شبانه روز به پنج وقت یا گاه تقیسم شده : وانگاه , ربیتونیگاه , ازیرنیگاه , اویسروتریمگاه و اشهینگاه . واژه هاتر یا هاسر در فرهنگ اوستا و پهلوی به جای ساعت به کار گرفته می شود و یک هاسر برابر است با یک ساعت و 12 دقیقه امروزی .
روزهای 30 گانه در این تقویم که هر یک به نام فرشته یا ایزدی نامگذاری شده است به شرح زیر می باشد :
هرمزد یا اهورازمزدا
بهمن یا وهومنه
اردیبهشت یا آش وهشت
شهریور یا خشتروئیریه
سفندارمذ یا سپنت آرمئیتی
خرداد یا هوروتات
امرداد یا امرتات
دی به آذر یا دئوش
آذر یا آتر
آبان
حورشید یا هورخشئت
ماه یا ماونگه
تیر یا تشتری
گوش یا گئوش
دی به مهر یا دئوش
مهر یا میتر
سروش یا سرئوش
رشن یا رشئو
فروردین یا فره وشی
بهرام یا ورترئن
رام یا رامن
باد یا وات
دی به دین یا دئوش
دین یا دئنا
ارد ( ارت ) یا اشی ونگوهی
ارشتاد ( اشتاد ) یا ارشتات
آسمان یا اسمن
زامیاد یا زم
ماراسپند ( مهر اسپند ) یا منثر سپنت
ائیران
در خرده اوستا در گفتاری تحت عنوان سیروزه میخوانیم , نگهبانی از 30 روزهای ماه به یکی از فرشتگان سپرده شد و به همان فرشته نامزد گردیده است و ایزدان معروف مزدیسنا , همان که روزهای ماه را به نامهای آنان خوانده اند و خود ایزدان بزرگ از همکاری مهین فرشتگان که آنان را امشاسپندان گویند , شمرده شده اند و بقیه همکاران و مددکاران آنها می باشند :
امشاسپندان = ایزدان همکار
هرمزد = دی به آذر , دی به مهر , دی به دین
بهمن = ایزد ماه , ایزد گوش , ایزد رام
اردیبهشت = ایزد آذر , ایزد سروش , ایزد بهرام
شهریور = ایزد خور , ایزد مهر , ایزد آسمان , ایزد ائیران
سفندارمذ = ایزد آبان , ایزد دین , ایزد ارت , ایزد ماراسپند
خرداد = ایزد تشتر ( تیر ) , ایزد فروردین , ایزد باد
امرداد = ایزد رشن , ایزد اشتاد , ایزد زامیاد
ماه در تقویم مزدیسنا
ماونگه در اوستا و در تقویم مزدیسنا , هم به مفهوم سیاره ماه ( قمر ) و هم به معنای شبانه روز از زمان است . در این تقویم هر 30 روز را یک ماه نامیده و هر سال را 12 ماه می گرفتند , بنابراین هم ماه و هم سال در این تقویم اصطلاحی است نه حقیقی . اسامی دوازده ماه این تقویم همان اسامی ایزدان معروف دین بهی زرتشتی است و در تقویم امروزی ایران نیز با کمی تغییر محفوظ مانده است . این ماه ها شامل زیر میباشد :
فروردین : فره وشی یا فروهر
اردیبهشت : اش وهشت
خرداد : خورداد , هوروتات
تیر : تشتری
مرداد : امرداد , امرتات
شهریور : خشتر وئیریه
مهر : میتر
آبان : آبها , آناهیتا
آذر : آتر , آتش
دی : دئو , دئنا ( خالق اوهرمزد )
بهمن : وهمن , وهومنه
اسفند : سفندارمذ , اسپنت ارمئتی
اسامی جشنها و زمان آنها :
1 ) فروردینگان = فروردین روز ( 19 ) در ماه فروردین
2 ) جشن اردیبهشتگان = اردیبهشت روز ( 3 ) در ماه اردیبهشت
3 ) جسن خردادگان = خرداد روز ( 6 ) در ماه خرداد
4 ) جشن تیرگان = تیر روز ( 13 ) در ماه تیر
5 ) جشن امردادگان = امرداد روز ( 7 ) در ماه امرداد
6 ) جشن شهریورگان = شهریور روز ( 4 ) در ماه شهریور
7 ) جشن مهرگان = مهر روز ( 16 ) در ماه مهر
8 ) جشن آبانگان = آبان روز ( 10 ) در ماه آبان
9 ) جشن آذرگان ( آذرخش ) = آذر روز ( 9 ) از ماه آذر
10 ) جشن هرمز = نخستین روز هر ماه
11 ) جشن خرم روز ( دی دادار جشن ) = دی روز در ماه دی
12 ) سپندار جشن = سفندارمذ روز ( 5 ) در ماه سپندارمذ
هر روزی که نام ماه و روز با یکدیگر برابر می شود ایرانیان باستان جشن می گرفته اند . امروزه نیز زرتشتیان این مراسم ها را اجرا میکنند . در تقویم مزدیسنا چون سال را 12 ماه 30 روزه حساب می شود پس 5 روز اضافی را به نام اندرگاه می نامیدند که این اسم در دوره اسلامی به پنجه دزدیده یا خمسه مسترقه معروف گردید . هر یک از پنج فصل گاتها نیز به یکی از روزهای اندرگاه منسوب شده است . اسامی این پنج روز عبارت است از :
اهنودگاه
اشتودگاه
سپندگاه
وهوخشتره گاه
هیشتواشت گاه
سال و سر آغاز آن
از زمان هخامنشیان که اصول تقویم نگاری مصری از آنان اخذ گردید , ماه ایرانی معادل با ماه توت مصری آغاز شد و به دنبال آن اصلاحاتی صورت گرفت . در ابتدا آغاز سال را از اول پائیز به آخر اسفند منتقل کردند و فروردین ماه را اول سال قرار دادند . آنگاه برای تثبیت محل آن , کبیسه ای در نظر گرفتند که با اعمال آن در هر دوره 120 ساله , آغاز سال در اول فروردین ماه ثابت می ماند . حمزه بن حسن اصفهانی ( متوفی 360 هجری ) به استناد خدایی نامه می نویسد :
ایرانی زرتشتی با اول فروردین ماه به آغاز خلقت منسوب است , زیرا خلقت در روز هرمزد از ماه فروردین در نقطه اعتدال ربیعی بود . بعضی ها این امر را به خود زرتشت نسبت میدهند و معتقدند که او این تقویم را بر اساس مبدا آفرینش نهاد و اولین روز از سال را اعتدال بهار قرار داد . در منابع دیگر نیز میخوانیم آغاز سال در تقویم مزدیسنا از دی ماه بود که علت آن را تعلق خطر ایرانیان به این ماه که منسوب به آفریدگار است می دانستند و معتقد بودند آنان آغاز سال را با ماهی که به پروردگار منسوب باشد , نیک میدانستند و چون کبیسه به طور دقیق اجرا نمی شد , به تدریج دی ماه به اعتدال ربیعی رسید و این زمان با اصلاحاتی که داریوش بزرگ با اقتباس از مصریان انجام داده بود مصادف گردید و چون اول ماه توت مصری , با اول ماه دی برابر بود , فروردین ماه را به جای دی ماه برگزیدند و سه ماه به عقب بردند و اعتدال ربیعی را سر آغاز تقویم مزدیسنا قرار دادند که این رسم هنوز پابرجاست . ( قانونی مسعودی ج 1 )
فصل در تقویم مزدیسنا
بنا به روایت یشتها و خرده اوستا در ایران قدیم تنها دو فصل تابستان و زمستان وجود داشته است که مدت آنها مساوی نبوده است . مثلا گاه تابستان هفت ماهه و زمستان پنج ماهه یا بر عکس بود و این امر به آب و هوای هر محل نیز بستگی داشته است . فصل تابستان معمولا از فروردین تا مهر و فصل زمستان از آبان تا اسفند به طول می انجامید که پنج روز "اندرگاه"در پایان زمستان هم یادآور پنج ماه زمستان بود . بعدها با گسترش دین زرتشت , سال به شش قسمت غیر مساوی تقسیم و یا شش فصل ( گاه ) تقسیم شد که هرکدام از آنها "ییر" و یا "رتو"خوانده می شد و آخر هر یک از این فصول جشن معروف گاهنبارها برگزار میگردید . این فصول شش گانه عبارت است از :
میذیوی زرمی : از اول اعتدال ربیعی تا روز چهل و پنج از آن است که تقریبا تا 15 اردیبهشت ادامه می یابد
میذیوی شم : به مدت 60 روز می باشد
پیتیش ههی : به مدت 75 روز می باشد
ایاترم : به مدت 30 روز
منیذیایری : به مدت 80 روز
همسیت منیذی : به مدت 75 روز
پس از سقوط شاهنشاهی هخامنشی و تسلط یونانیان بر ایران و تاسیس دولت سلوکیان و سپس رواج تقویم یونانی در ایران , تقویم مزدیسنا از رسمیت افتاد و به دنبال آن در دوره اشکانی اگر چه این تقویم در میان عامه مردم معمول بود , ولی به دلیل بی دقتی در اعمال کبیسه مورد استفاده قرار نگرفت و به تدریج به طور کلی مغشوش شد تا اینکه در دوره ساسانیان مجددا زنده شد . امپراتوری سترگ ساسانیان سیاست خویش را بر حمایت از دین زرتشت نهاد و در ابتدای امر به احیای آن اقدام نمود . در نتیجه به منظور برقراری مراسم دینی و دقت و صحت هر چه بیشتر در اعمال فرایض دینی آن , به تجدید حیات تقویم مزدیسنا و اصلاحات اساسی در آن پرداخت . به دنبال این روند تقویم مزدیسنا در دوره ساسانی با حفظ خصوصیات دینی , تقویم رسمی و سیاسی کشور ایران شد و مبدا آن از جلوس اردشیر پاپکان و تاسیس امپراتوری بزرگ ساسانیان در سال 224 پس از میلاد قرار گرفت و شاهنشاهان بعد از او نیز همین روش را در پیش گرفتند تا به نام آخرین فرمانروای نگونبخت این سلسله , یزدگرد سوم نامیده شد .
تقویم یزدگردی :
تقویمی که بعد از انقراض سلسله ساسانی در نزد ایرانیان که دین خود را حفظ کرده بودند رایج شد تقویم بزدگردی نام گرفت . این تقویم برای ایرانیان هند , پاکستان و ایران جهت استفاده در مراسلات و مکاتباتشان استفاده می شد . از آنجا که این تقویم ادامه تقویم فرس قدیم و مزدیسنا است , تاریخچه پیدایش آن از اسطوره های ملی ایران سرچشمه میگیرد . برخی آن را به هوشنگ شاه پیشدادی و برخی دیگر به جمشید شاه نسبت داده اند . همچنان که در تقویم یزدگردی نیز بعضی ها سال جلوس و برخی سال مرگ پادشاه را مبدا قرار داده اند.
در این تقویم سال را 365 روز حساب میکنند و روزهای سال را به طور مساوی به 12 ماه 30 روزه تقسیم میکنند و پنچ روز اضافی را بعد از آخر ماه اسفند و یا اول ماه فروردین می آورند , اسامی 12 ماه همان اسامی سال شمسی امروزی است . ایرانیان قدیم , خرده ایام , یعنی تقریبا شش ساعت مانده از هر سال را با اعمال کبیسه ای به نام بهیزک جبران میکردند , اما بعد از سقوط سلسله ساسانیان برخی از زرتشتیان دیگر کبیسه و بهیزک را در نظر نگرفتند و سال را تنها 365 روز حساب کردند , در نتیجه اول فروردین ماه هر سال یک روز و شش ساعت عقب می رود و نوروز حقیقی با زمان تحویل آفتاب در برج حمل برابر نمی شود و در یک دوره 1461 ساله دوباره به نقطه اول می رسد .
برخی از تقویم های موجود ایران کهن :
در روزگار امروز , ایرانیان تقویم های متعددی را جهت زندگی شخصی خویش انتخاب نموده اند تا این تمدن و هویت ملی خویش را زنده نگهدارند . تقویم رسمی ایران خورشیدی است ولی هنوز تقویم های کهن ایرانی در نزد اشخاص استفاده می شود :

7029 میترایی :
پیدایش آئین مهر در ایران , مهرپرستی یکی از قوی ترین کیشهای جهان به حساب می آید که روزگاری اروپا را در نیز تحت کیش خود قرار داده بود . گرچه به عنوان دین شناخته نشده است ولی یکی از مهم ترین آئین های جهان بوده است . ایرانیان این آئین جهانی را که از ایران به دنیا صادر شد را مایه مباهات خویش می دانند و پیدایش مهر و انسانیت و محبت را ریشه در هویت ملی خود می دانند . اعتبار این تقویم تائید نشده است و فقط بر اساس حدسیات و پژوهش های افراد محقق است .
3745 زرتشتی :
تقویم رسمی زرتشتیان امروز جهان , این تقویم در هند , پاکستان , ایران و تمام زرتشتیان جهان امروز استفاده می گردد . ظهور اشو زرتشت اسپنتمان , پایه گذاری نخستین دین یکتاپرستی جهان , دعوت جهان به خردورزی و طلح و دانش و ایجاد بزرگترین اندرز انسان ساز جهان : کردار نیک - گفتار نیک - پندار نیک . این تقویم حداقل سال پیدایش ظهور زرتشت را در نظر گرفته است . زیرا به عقیده بسیاری از محقیقن و تاریخ نگاران جهان ظهور وی به 3700 تا 5500 سال پیش باز میگردد .
2619 مادی :
پایه گذاری نخستین امپراتوری بزرگ ایرانیان توسط اقوام مادها در خاورمیانه . این حکومت به عنوان نخستین دولت ایرانی قدرتمند در خاورمیانه شناخته شده است . مادها اقوام کهن ایرانی هستند که امروزه شامل : آتروپاتکان ( آذربایجان ) - کردستان ترکیه - کردستان عراق - کردستان سوریه و ایران - آران و شیروان و ارمنستان و برخی مناطق شمالی ایران می باشد که پس از حکومت قاجار و یورش سپاه متجاوز ترکان عثمانی به اشغال بیگانگان در آمده است .
2566 تاجگذاری کورش بزرگ :
تاجگذاری نخستین پادشاه خردمند - طلح طلب جهان که پایه گذار اصلی سازمان ملل متحد و سازمان جهانی حقوق بشر امروز در آن روزگار بوده است . در روزگاری که شاهان و رهبران کشورهای دیگر دست و پاهای و گردن قطع می نمودند و زنا و فحشا و فساد سمبول تمدنهای باستانی آن روزگار بود - کوروش بزرگ در ایران ظهور نمود و به حکومت ماد خاتمه داد و از ماد و پارس و پارت ( اقوام ایرانی ) قدرتمندترین کشور جهان آنروزگار را بنا ساخت و ریشه تجاوز به ایران را خشکانید . وی مردمان را به یکتاپرستی - خرد و دانش - منش و کردار نیک - آزادی انسان در انتخاب دین و باور مذهبی - آزادی اقوام در آزادی زبان و آداب و رسوم خود دعوت نمود . وی پس از ورود به هر کشوری مردمانش وی را ناجی خداوند و فرزند صالح پروردگار خطاب نمودند . نام وی در تورات و قرآن نیز آمده است . ذر تورات وی به نام کوروش فرزند صالح خداوند نام برده است و در قرآن به نام ذوالقرنین ذکر شده است . کوروش بزرگ یکی از سه ابر مرد جهان معرفی شده است . پس از وی اسکندر و سزار می باشند .
1376 یزدگردی :
ایرانیان یاد و خاطره پایان سلسله ساسانیان و برچیده شدن دودمان ایرانی را توسط اعراب زنده نگاه داشته اند . این تقویم امروزه کاربرد دارد و شرح آن در بالای این جستار ذکر شده است .

1386 خورشیدی :
پس از ورود اسلام با در نظر گرفتن هجرت پیامبر و تغییرات ماه و سال ایرانی و محفوظ نگاه داشتن نوروز در ایران تقویم خورشیدی برای دوری جستن از تقویم اعراب بدوی ( هجری قمری ) ایجاد شد . مورخین این حرکت را به حکیم دانشمند عمر خیام نیشابوری نسبت داده اند
پیشینه تاریخی یهودیان در ایران
· چکیده
· مقدمه
· روش شناسی تحقیق
· مفاهیم تحقیق
o تاریخچه حضور در ایران
o هامان و یهودیان
o دوران اشکانیان
o دوران ساسانی
o دوره اسلامی
o عصر مغول
o از صفویه تا قاجار
o سلسله پهلوی و پادشاهی رضا شاه
o سلسله پهلوی و پادشاهی محمد رضا شاه
o انقلاب اسلامی
o شرایط فعلی در ایران
o تبعیض علیه یهودیان
o ارتباط با یهودیان خارج از ایران
o مراکز یهودیان ایران
o آموزش یهودی در ایران
o جاذبه های دیدنی یهودی ایران
o یهودیان ایرانی در خارج از مرزهای ایران
o یهودیان ایرانی مشهور
چکیده
این مقاله به بحث درباره یهودیانی که در سرزمین ایران ساکن شده اند می پردازد؛ و رفتار ایرانیان را در ادوار مختلف تاریخی بررسی می کند. آنچکه از فرهنگ ایرانی مشهود است احترام به همه ادیان و باورهای گوناگون میباشد . هزاران سال است که مردم ایران با همه ادیان و باورها از زرتشتی تا کلیمی و بهایی و شیعه و سنی و ارمنی و یهودی و . . . در کنار یکدیگر زندگی کرده اند و هیچگاه قومی بر قومی دیگر که هم مذهب وی نبوده شمشیر نکشیده است . هرآنچه که به صورت تبیعض و جفا در برخی موارد به صورت مقطعی بر دیگر ادیان روا شده است بر اثر حکومتهای دینی خاص شده است که مذهبی را راس کار قرار دادند و دیگر ادیان را به کنار زدند . در فرهنگ ایرانی هیگاه چنین چیزی دیده نمی شود . اندیشه های ناب مولانا جلال الدین محمد بلخی راهگشای ما در این احترام به ادیان است . در ایران بزرگ و متمدن بایستی بر همگان بچشم یکسان نگریسته شود تا همچون گذشته سرلوحه دیگر ملل شویم .
کلیدواژگان: یهودیان ایرانی- صهیونیسم-
Tanakh- شبّات- کاشر- نتوری کارتاNeturei Karta
مقدمه
حضور دین یهود و یهودیان در ایران به تاریخی دور می رسد. دین یهود از قدیمی ترین دینهای مو جود در ایران می باشد. بخشهای عظیمی از کتاب مقدس به وقایع مربوط به زندگی یهودیان ساکن ایران اشاره دارد و حتی نام ایران همپای نام ارض موعود در کتاب مقدس ذکر می شود. هنوز هم ایران بیشترین تجمع جمعیت یهودی ساکن یک کشور مسلمان را دارا می باشد.
یهودیان ایرانی با تاریخی پرفراز ونشیب روبرو بوده اند: از آزادی بزرگی که به دست کورش در 500 پیش از میلاد به آنان داده شدکه نقطه عطفی در تاریخ یهود بعد از شکنجه ها و آزارهای رفته شده بر آنان در بابل و بدست نبوکد نصر بود. در دوران اشکانیان آنان از اقلیتهای تحت حکومت خود محافظت می کردند و یهودیان نیز در جنگهای بین پارتیان و رومیها متحد پارتیهای ایران شدند. در دوران ساسانیان دین زرتشت دین رسمی حکومت گردید و در نتیجه سایر دینها بکنار رفتند . در دوران بعد از اسلام و بعد از آنکه ایران توسط مسلمانان فتح شد، یهودیان، مسیحیان و زرتشتیان ایران عنوان ذمی گرفتند آنان می توانستند بر دین خود باقی بمانند ولی باید علاوه بر خراج جزیه نیز می پرداختند. این شرایط تا زمان حمله مغولها باقی بود. در عصر مغول رفتار با ادیان مختلف مورد تساهل بیشتری قرار گرفت. آنها از اقلیتهای دینی برای پستهای اجرایی استفاده
می کردند و آزادیهای بیشتری برای اقلیتها قایل بودند. در دوران صفویه وضع یهودیان بدتر گردید و این آزارها در دوران قاجار نیز ادامه پیدا کرد. در دوران رضا شاه نگاه سنتی به یهودیان کاهش یافت و محدودیتهای اعمال شده بر اقلیتهای مذهبی برداشته شد. بعد از انقلاب اسلامی و برگشت امام خمینی از تبعید، ایشان با نمایندگان جامعه یهودیان ایران دیدار کرد و فتوایی صادر کرد تا بر اساس آن از یهودیان حمایت شود. به هرحال پس از تمام این آمد و شد ها باید گفت که اکنون جامعه یهودی ایران از ثبات قابل قبولی برخوردار است. جامعه یهودی ایران دارای افراد بسیار معروفی است که در سراسر دنیا حضور دارند و پستهای مهمی را دارا هستند و هرگز حس ایرانی بودن خودرا فراموش نکرده اند. بسیاری از یهودیان ساکن در ایران امکان این را دارند که به خارج از ایران مهاجرت کنند و حتی به انجام مهاجرت تشویق نیز می شوند ولی اکثریت مطلق آنها همچنان در ایران باقی مانده اند و خود را ایرانی می دانند.
روش شناسی تحقیق
این تحقیق عمدتا با استفاده از منابع اینترنتی انجام شده است. از سایتهایی ذکر شده در قسمت منابع استفاده شده است. همچنین از مطالب سایتهای خبری برای دستیابی به جدیدترین خبرها درباره جامعه یهودیان بهره برداری شده است.
مفاهیم تحقیق
یهودیان ایرانی: یهودیان ایران، ایرانیان یهودی به آن دسته از ایرانیانی اطلاق می شود که از نظر تاریخی در پادشاهی ایران و یا ایران کنونی زندگی می کردند.
صهیونیسم: یک جریان سیاسی و همچنین ایدئولوژی می باشد که خواستار تشکیل وطنی برای یهودیان در سرزمین فلسطین می باشد. واژه صهیون نام کوهی در اسرائیل است .
تنخ Tanakh: خلاصه ای از سه اسم تورات Torah، نوییم Nevi'im ، کتوویم Ketuvim می باشد که در مجموع عهد عتیق یا قسمت عبری کتاب مقدس را تشکیل می دهد.
شبّات: نام عربی این روز یوم السبت می باشد. بر طبق کتاب مقدس خداوند شش روز به آفرینش مشغول بود و روز هفتم استراحت کرد. یهودیان به حرمت این روز دست از کار می شویند و در خانه به دعا و نیایش مشغول می شوند.
کاشر: یهودیان مانند مسلمانان فقط اجازه دارند تا از گوشت ذبح شده و غذای آماده شده بر طبق آیین دینی خود استفاده کنند. به غذایی که به این شیوه آماده شود کاشر می گویند.
نتوری کارتاNeturei Karta: که به زبان آرامی به معنای محافظین شهر می باشد،فرقه ای از یهودیان
Haredi (Ultra-Orthodox)می باشند که صهیونیسم را رد می کنند و خواستار برچیده شدن دولت اسراییل می باشند. مرکز اصلی آنان اورشلیم است و شعبات اصلی آنان در نیویورک و بیت شمش Beit Shemesh در نزدیکی اورشلیم است.پیشینه حضور یهودیان در ایران
یهودیان ایران، ایرانیان یهودی به آن دسته از ایرانیانی اطلاق می شود که از نظر تاریخی در پادشاهی ایران زندگی می کردند و یا در ایران کنونی زندگی می کنند.
دین یهودی از قدیمی ترین دینهای موجود در ایران می باشد و سابقه حضور آن در ایران به دوران ثبت شده در کتاب مقدس باز می گردد. کتابهای اشعياء، دانیال، نحمیا، کتاب تواریخ و استر به وقایع مربوط به زندگی یهودیان ساکن ایران می پردازد.
عنوان یهودیان ایرانی به تمامی یهودیانی اطلاق می شود که در ایران ساکن بودند و می باشند و به یکی از زبانهای ایرانی صحبت می کنند. به ایرانیان ساکن اسراییل که اکثریت مطلق آنان یهودی می باشند عنوان Parsim به معنای پارسیان داده شده است.
بیشترین تجمع یهودیان ایرانی در اسراییل می باشد که بر طبق آمار سال 1993 و با احتساب نسل دوم یهودیان ایرانی بر 75000 بالغ می شود1. در ایالات متحده حدود 45000 یهودی ایرانی نسل اول ساکن هستند که اکثریت مطلق آنان در لوس آنجلس و ناحیه گریت نِکGreat Neck نیویورک زندگی می کنند. بر طبق آمار مختلف بین 30000 تا 40000 یهودی در ایران زندگی می کنند که عدد 35000 رقمی است که اکثر منابع ذکر می کنند. اکثر این یهودیان در تهران، اصفهان و شیراز زندگی می کنند. به نقل از BBC در یزد هنوز 10 خانواده یهودی ساکن هستند که حداقل 6 خانواده از طریق ازدواج با هم نسبت دارند؛ گرچه بعضی ها تعداد یهودیان ساکن یزد را بیشتر تخمین می زنند. در طول تاریخ بسیاری از شهرهای ایران میزبان یهودیان بودند و هنوز هم ایران بیشترین جمعیت یهودی ساکن در یک کشور مسلمان را داراست2. همچنین اقلیت یهودی ایرانی در اروپای غربی، استرالیا و کانادا وجود دارد. در طول تاریخ بعضی از گروه های یهودی ایرانی از بدنه اصلی جدا شده اند و گروه های قومی مذهبی جدیدی را به وجود آورده اند و اکنون به نامهای متفاوتی خوانده می شوند؛ مانند یهودیان بخارا و یهودیان کوهستان. همچنین چندین هزار مسلمان در ایران هستند که والدینشان از یهودیت به اسلام گرویده اند.
تاریخچه حضور در ایران
نبوکدنصر سه بار در قرن 6 پیش از میلاد یهودیان ساکن پادشاهی یهودیه را به بابل تبعید کرد. این سه تبعید مجزا در کتاب ارمیاء(30- 28 :52)ذکر شده است. اولین تبعید در سال 597 پیش از میلاد در زمان پادشاهی یهوه یاقیم بود که در طی آن معبد اورشلیم تا حدی آلوده شد و بعضی از سران قوم به عنوان گروگان به اورشلیم برده شدند. 11 سال بعد شورشی جدید رخ داد و در نتیجه شهر با خاک یکسان شد و تعداد زیادتری به بابل برده شدند. 5 سال بعد شورشی دیگر رخ داد و در پی آن تبعیدی جدید صورت گرفت. در سال 537 پیش از میلاد کورش کبیر بر بابل غلبه کرد و به یهودیان اجازه بازگشت به سرزمین اصلی را داد که بر طبق کتابهای نحمیا و ازرا بیش از 40000 نفر حاضر به بازگشت شدند. کورش به آنان آزادی مذهبی داد و دستور داد تا معبد دوم بر خرابه های معبد اول ساخته شود. اما ساخت معبد در زمان داریوش اول و تحت نظارت حجّی و زکريا صورت گرفت. معبد در سال 515 پیش از میلاد آماده تقدیس شد.
هامان و یهودیان
بر طبق کتاب استر، هامان نجیبزاده ای آگاگایی بود که مشاور و وزیر دربار شاه آهاسوئِروس نیز بود، که متخصصان کتاب مقدس معمولا با خشایارشاه یکی می دانند. او و همسرش زِرِش تصمیم به نابودی یهودیان پارس گرفتند ولی استر که همسر یهودی شاه بود نقشه او را خنثی کرد و در نتیجه هامان و ده پسرش اعدام شدند. این وقایع را در جشن عظیم پوریم یهودیان سالانه گرامی می دارند.
دوران اشکانیان
منابع یهودی درباره پارتیان و اشکانیان صحبت نمی کنند، زیرا نام پارتیان اصلا ذکر نمی شود. در کتاب "وقایع نگاری مختصر" از شاهزاده ارمنی، ساناکروتس، که به خانواده سلطنتی اشکانیان تعلق داشت با نام Diadochoi یا یکی از جانشینان اسکندر نام برده می شود. در همان دوران، شاه سوریه انتیوخوس سیدیتس Antiochus Sidetes، به همراهی هیرکانوس اول به ناحیه بابل تحت کنترل اشکانیان هجوم برد و به سال 129 پیش از میلاد در کنار رود زاب لشگر پارتیان را شکست داد و به دلیل روز شبّات و جشن هفته ها دو روز لشگر اردو زد و متوقف شد. در سال 40 پیش از میلاد، شاه دست نشانده یهودی، هیرکانوس دوم، به دست اشکانیان افتاد و آنان بر طبق رسم خود، گوشهای او را بریدند تا او را از ادعای مجدد سلطنت باز دارند. به نظر می رسد یهودیان بابل قصد داشتند هیرکانوس تبعیدی را مستقل از سازمان کاهنان اورشلیم به منصب کاهن گادول (کاهن اعظم) برسانند ولی عکس آن رخ داد. یهودی بابلی، به نام آنانِل Ananel، به منصب تازه تاسیس کاهن گادول بابل رسید که نشان دهنده میزان آزادی و اهمیت یهودیان بابل است. گرچه هنوز در تمامی موارد دینی وابسته به سرزمین مقدس بودند و در فستیوالهای مهم به زیارت ارض مقدس می رفتند.
پادشاهی اشکانیان، علیرغم سیستم نامتمرکز آن، بسیار پایدار بود. قطعا نبود حکومت مرکزی قوی نکات منفی نیز به همراه داشت، مانند پدیدآمدن حکومت یهودی در نهارده Nehardea. اما میزان تساهل و تسامح حکومت اشکانی به همان اندازه هخامنشیان شگفت آور بود. در بعضی از منابع ذکر شده است که شاهان پارتی آدیابن Adiabene به یهودیت گرویدند. اینگونه وقایع نه تنها نشانگر تساهل و تسامح دولت اشکانی بود، بلکه همچنین نشان می داد که آنان به چه میزان خود را وارث کورش کبیر می دیدند. آنها آنچنان از اقلیتهای تحت حکومت خود محافظت می کردند که یک ضرب المثل قدیمی یهودی می گوید: "هروقت یک اسب جنگی پارتی را بسته بر سنگ قبری در سرزمین اسراییل دیدی، بدان که ساعت ظهور مسیح نزدیک است."3
یهودیان بابل خواستار آن بودند که همراه یهودیان ساکن یهودیه با وسپاسین Vespasian بجنگند، ولی در زمان امپراطور ترایان Trajan بود که یهودیان در نهایت در جنگ علیه او شرکت کردند و تا حدی به دلیل شورش یهودیان بابل بود که رومیها نتوانستند حاکم بابل شوند. به نقل از فیلو Philo جمعیت یهودی زیادی در بابل ساکن بودند و قطعا پس از خرابی اورشلیم بر جمعیت یهودی ساکن آن به شدت اضافه شد. یهودیان اورشلیم همیشه برای کمک به شرق نگاه می کردند و می دانستند که یهودیان بابل توانایی رساندن کمک به آنان را دارند. با سقوط اورشلیم، بابل به پایگاه اصلی یهودیت بدل شد. پس از شکست شورش بار کوچبا Bar Kochba قطعا بر جمعیت آوارگان یهودی ساکن بابل افزوده شد.
در جنگهای بین پارتیان و رومیها، یهودیان دلایل بسیاری داشتند تا از رومیان متنفر باشند، زیرا رومیان مکانهای مقدس آنان را از بین برده بودند، و این باعث شد تا یهودیان خواستاراتحاد با پارتیها شوند. پادشاهان اشکانی شاهزادگان تبعیدی را که تا آن زمان فقط حاکمان محلی و جمع آوران مالیات بودند، به درجه شاهزادگی،Resh Galuta ، ترفیع دادند، که این امر احتمالا در قدردانی از خدمات این قوم بوده است. به این ترتیب، یهودیان ایرانی دارای قدرتی متمرکز شدند که در همه حال پشتیبان آنان باشد و شرایط پیشرفت آنان را هموار کند و مشکلات داخلی آنان را برطرف نماید.
دوران ساسانی
در ابتدای سده سوم، تاثیر پارسیان در حال اوج گرفتن بود. در زمستان 256 پس از میلاد، اردشیر اول آخرین پادشاه اشکانی را شکست داد و اشکانیان را بر کنار کرد و سلسله ساسانیان را تاسیس کرد. در زمان اشکانیان فرهنگ هلنیستی در بین اشکانیان و پارتیان تاثیر گذاشته بود، ولی در این سلسله جدید، بخش ایرانی فرهنگ تقویت شد و از زبان پهلوی پشتیبانی کردند و دین قدیمی زرتشتی دین رسمی حکومت گردید4. در نتیجه سایر دینها تا بکنار رفت .
شاپور دوم (که شکل آرامی آن Shvor Malka است) با یهودیان روابط حسنه ای داشت. دوستی او با جامعه یهودیان و شخص شمویل Shmuel برای آنان منافع زیادی به همراه داشت. مادر شاپور دوم یهودی بود و این یکی از دلایل آزادی نسبی یهودیان در زمان او بود. او همچنین دوست یکی از ربی های یهودی ذکر شده در تلمود به نام رباRaba بود. ربا از طریق نزدیک شدن به شاهنشاه توانست قوانین ظالمانه بر ضد یهودیان را لغو کند و ممنوعیتهای اعمال شده بر ضد آنان را بر دارد. حتی ربا بهترین شاگردش را که آبایه Abaye نام داشت، Shvur Malka می نامید که به معنای شاپور شاه یود؛ زیرا آن شاگرد بسیار زیرک و باهوش بود.
البته یهودیان و مسیحیان گاهی بدلایل سیاسی آزار میدیدند ولی یهودیان به دلیل اینکه در شهرهای بزرگ و به شکل گروه های متنفذ و قدرتمند زندگی می کردند، معمولا از این مسایل آسیب بسیار کمتری می دیدند. معمولا دوره کوتاهی از آزار و اذیت وجود داشت و در پی آن دوره طولانی بی توجهی به جامعه یهودی دیده می شد. گرچه در دوره یزدگرد دوم و پیروز، یهودیان به شدت آسیب دیدند و تحت شدیدترین آزارها قرار گرفتند.
دوره اسلامی (1255-634)
پس از آنکه ایران توسط مسلمانان فتح شد؛ یهودیان، مسیحیان و زرتشتیان ایران عنوان ذمّی گرفتند و با آنان به عنوان شهروندان درجه دوم جامعه اسلامی رفتار می شد.رفتار با این ادیان بسیار بدتر از پیش از اسلام بود .کافران ذمّی اجازه داشتند تا بر دین خود بمانند، آداب دینی خود را برپا دارند ولی از سوی دیگر مجبور بودند علاوه بر خراج، جزیه نیز به فاتحان عرب بپردازند. همچنین آنان مجبور بودند یک سری از قوانین و آداب خاص را بپذیرند؛ مانند اینکه حق حمل سلاح نداشتند، در بعضی اوقات اجازه سوارکاری از آنان گرفته می شد و در دادگاه ها، هنگامی که یکی از طرفین مسلمان بود، اجازه شهادت دادن نداشتند. در بسیاری از این دورانها، آنان مجبور بودند تا لباسهای متمایزی از مسلمانان بپوشند. اگرچه در بعضی زمانها این قوانین و محدودیتها تا حدی نادیده گرفته می شدند ولی این شرایط ناعادلانه تا زمان فتح ابران به دست مغولها باقی بود.
عصر مغول (1318-1256)
در 1255، مغولها به رهبری هولاگوخان به سایر نقاط ایران که هنوز به تصرف مغولان در نیامده بود هجوم آوردند و در 1257 بغداد را تسخیر کردند و به خلافت عباسی پایان بخشیدند. در ایران ایلخانان بر سر کار آمدند و چون در نظر آنان تمامی ادیان برابر بودند، قوانین ناعادلانه برضد ذمیها بر طرف شد. ارغون شاه، یکی از حاکمان ایلخانی، یهودیان و مسیحیان را برای پستهای اجرایی بر مسلمانان ترجیح می داد و به عنوان مثال سعد الدوله را که یک یهودی بود به منصب وزارت خود برگزید. این انتصاب به هیچ وجه مورد پسند علما مسلمان قرار نگرفت و پس از مرگ ارغون شاه در 1291، سعد الدوله کشته شد و یهودیان ایران به شدیدترین وجهی تحت آزارهای بسیار قرار گرفتند. به گفته مورخ مسیحی همعصر با این وقایع، بار هبریوس Bar Hebraeus، خشونتی که علیه یهودیان اعمال شد"نه زبان قادر است بیان کند و نه قلم که بنگارد"5 هنگامی که غازان خان در سال 1295 به اسلام گروید، سرآغاز دورانی تاریک برای یهودیان بود. آنان دوباره ذمّی به حساب آمدند. جانشین غازان خان، الجایتو، کنیسه های بسیاری را از بین برد و فرمان داد تا یهودیان نشانه ای را بر سر ببندند؛ البته مسیحیان نیز در این سرنوشت شریک بودند. بعضی از یهودیان تحت این فشارها اسلام آوردند. معروفترین این تازه مسلمانان، رشید الدین بود که طبیب، تاریخدان و سیاستمداری بود که برای پیشرفت در دربار الجایتو اسلام را انتخاب کرده بود. ولی در سال 1318، او را به اتهام واهی مسموم کردن الجایتو اعدام کردند و سر او را چندین روز در شهر تبریز به گردش درآوردند. در حدود 100 سال بعد، میرانشاه قبر او را خراب کرد و بقایای او را در یک قبرستان یهودی دفن کردند. اتفاقی که برای رشیدالدین افتاد، بیانگر نوع رفتار ایرانیان با یهودیان تازه مسلمان بود که با سایر کشورهای مسلمان فرق داشت. مشابه این سوء رفتار در شمال آفریقا نیز دیده میشد. در اکثر کشورهای مسلمان به نومسلمانان اکرام می شد و آنان را به راحتی در جمع خود می پذیرفتند. ولی در ایران یهودیانی که تغییر مذهب داده بودند را تا چندین نسل بعد هم نمی پذیرفتند و به دلیل سابقه یهودی، آنها را خوار می شمردند.
از صفویه تا قاجار (1925-1502)
در دوران حکومت صفویه بدلیل گسترش و رسمی شدن مذهب شیعه وضع یهودیان بدتر شد، پس به همین دلیل هر نوع تماسی با آنان باعث می شد تا فرد مسلمان پیش از ایستادن به نماز غسل کند. به همین دلیل، حکمفرمایان و بیشتر از آنها مردم عامی روابط خود را با آنان محدود کردند. یهودیان اجازه نداشتند همراه با مسلمانان به حمامهای عمومی بروند و با در روزهای بارانی و برفی از خانه خارج شوند؛ زیرا باران ناپاکی را از آنان به یک مسلمان منتقل می کرد.
حکومت شاه عباس در ابتدا برای یهودیان نیک بود؛ یهودیان اجازه یافتند در اصفهان ساکن شوند و وضعیت مالی آنان بسیار بهتر شد. ولی در دوران پایانی سلطنت او وضع یهودیان بد شد. به پیشنهاد یک یهودی که تغییردین داده بود و مسلمان شده بود، یهودیان مجبور به پوشیدن علامتی خاص بر روی لباسشان شدند. در سال 1656، به دلیل آنکه یهودیان نجس دانسته می شدند، تمامی یهودیان اصفهان مجبور به تغییر دین و یا خروج از اصفهان شدند. ولی در پی اینکه مشخص شد یهودیان تغییردین داده در خفا بر دین سابق پایبند هستند و مراسم مذهبی خود را انجام می دهند، و از آنجا که خزانه کشور به دلیل نبود جزیه نقصان دیده بود، در سال 1661 یهودیان اجازه یافتند به دین سابق خود رجعت کنند ولی مجبور بودند که علامت مشخصه ای بر روی لباس خود داشته باشند.
در زمان پادشاهی نادرشاهِ سنی (1747-1736) دین رسمی ایران، مذهب تشیع، ملغی شد و یهودیان دوره کوتاهی از تساهل و تسامح مذهبی را تجربه کردند و حتی اجازه یافتند تا در شهر مشهد ساکن شوند. ولی با به روی کار آمدن سلسله قاجار شیعه مذهب در سال 1794 آزار سابق از سر گرفته شد. در میانه سده نوزدهم J.J. Benjamin درباره زندگی یهودیان ایران این چنین نوشته است:"...آنها مجبور هستند در گوشه ای از شهرجدا از سایر مردم زندگی کنند...؛ زیرا آنان را موجوداتی کثیف می دانند...و به بهانه اینکه نجس هستند، به بدترین وجهی با آنان برخورد می کنند و در صورتی که وارد خیابان مسلمانان شوند، یچه ها و جمعیت حاضر در آن خیابان به آنان سنگ و گل ولای پرتاب می کنند... و به همین دلیل در هنگامی که باران می آید حق بیرون رفتن ندارند؛ زیرا چنین فکر می کنند که آنان آب باران را نجس کرده و پای مسلمانان را کثیف می کنند... اگر در خیابان متوجه شوند که کسی یهودی است، شدیدترین توهینها را به او می کنند. عابران به صورت او آب دهان خواهند انداخت و او را ضرب و شتم خواهندکرد... بیرحمانه...هنگامی که یک یهودی وارد مغازه ای می شود، حق بازرسی کالا و اجناس را ندارد... اگر دستان او ناخواسته به کالایی بخورد، مجبور است آن کالا را به هر قیمتی که فروشنده طلب می کند بخرد... گاهی مسلمانان وارد خانه یهودیان می شوند و هرچه را که دلشان می خواهد بر می دارند. اگر صاحب مال کوچکترین مقاومتی بکند، حیات خود را به خطر می اندازد... اگر...یک یهودی در سه روز پایانی دهه اول محرم خود را در خیابان نشان دهد...، قطعا کشته می شود."6
لرد کرزون تفاوت در وضع زندگی یهودیان مناطق مختلف ایران را چنین بیان می کند: "در اصفهان، که گفته می شود وضع زندگی آنان از سایر نقاط ایران بهتر است، اجازه به سر گذاشتن کلاه ندارند، حق ندارند در بازار حجره ای داشته باشند، دیوار خانه شان به بلندای دیوار همسایه مسلمانشان باشد و در خیابانها سواره حرکت کنند. در تهران و کاشان آنان به تعداد زیاد زندگی می کنند و جایگاهی نسبتا خوب دارند. در شیراز وضع زندگی آنان بسیار بد است. در بوشهر آنان آزادانه زندگی می کنند و هیچ نوع آزاری در موردشان صورت نمی گیرد."
در سده نوزدهم موارد بسیاری از تغییر دین اجیاری و قتل عام در باره یهودیان اعمال شد. در 1830 بعضی از یهودیان تبریز قتل عام شدند؛ در همان سال بعضی از یهودیان شیراز مجبور به تغییر دین شدند. گرچه بر اساس گزارش سیاحان اروپایی، یهودیان مراسم دینی خود را علیرغم تهدیدهای دایمی در خفا انجام می دادند. یهودیان بارفروش در سال 1866 مجبور به تغییر دین شدند و تنها با دخالت سفیران بریتانیا و فرانسه بود که آنان اجازه یافتند به دین خود برگردند؛ ولی در آشوبی که در پی آن پدید آمد 18 یهودی کشته شدند، که دو تن از آنان زنده زنده به آتش کشیده شدند. در سال 1910 یهودیان شیراز متهم به کشتن آیینی یک دختر مسلمان شدند. در پی آن کل محله یهودیان غارت شد و اولین کسانی که غارت را آغاز کردند سربازانی بودند که از سوی حاکم محلی برای دفاع از سکنه یهودی شهر فرستاده شده بودند. 12 یهودی که سعی کرده بودند از اموال خود دفاع کنند کشته شدند و بسیاری نیز زخمی شدند. در پایان سده نوزدهم و ابتدای سده بیستم، هزاران یهودی ایرانی، به دلیل شرایط غیر قابل تحمل ،به فلسطین مهاجرت کردند.
سلسله پهلوی و پادشاهی رضا شاه
این سلسله خواستار مدرن کردن ایران بود، و در نتیجه رفرمهای آنان وضع یهودیان ساکن ایران بهتر شد. تاثیرات نگاه سنتی به یهودیان کاهش یافت و محدودیتهای اعمال شده بر اقلیتهای مذهبی برداشته شد. رضا شاه تغییر دین گروهی را ممنوع اعلام کرد و این ایده نجس بودن غیر مسلمانان را ممنوع اعلام کرد. در مدارس یهودی زبان عبری مدرن را جزو برنامه درسی آنان کرد و روزنامه های یهودی منتشر شد و همچنین یهودیان اجازه یافتند شغلهای دولتی داشته باشند. ولی با تمام این احوال، مدارس یهودی در دهه 1920 تعطیل شد و نزدیکی رضا شاه با آلمان نازی، یهودیان ایران را تا حدی نگران ساخت.
سلسله پهلوی و محمد رضا شاه
در سال 1948 دولت اسراییل تاسیس شد و این مساله باعث تشدید حس یهودی ستیزی در ایران شد. ضعف دولت مرکزی و جنگ قدرت بین مصدق، شاه و آیت الله کاشانی بر این احساسات افزود. بر اساس تخمین ها حدود یک سوم یهودیان ایران در بین سالهای 1948 تا 1953 به اسراییل مهاجرت کردند که اکثر آنان به دلیل وضع بد مالی دست به مهاجرت زدند. بعضی رقم کلی مهاجران ایرانی به اسراییل را در بین سالهای 1948 تا 1978 در حدود 70000 تخمین می زند.
سرنگونی محمد مصدق و استقرار پادشاهی محمد رضا شاه، دوران شکوفایی یهودیان در ایران است. در دهه 70 فقط ده درصد یهودیان زیر خط فقر زندگی می کردند؛ 80 درصد طبقه متوسط بودند و 10 درصد جزو طبقه مرفه به حساب می آمدند. با اینکه در سال 1979 یهودیان درصد بسیار کمی از جمعیت ایران را تشکیل می دادند ولی 2 نفر از 18 عضو آکادمی علوم، 80 نفر از 4000 استاد دانشگاه و 600 نفر از 10000 دکتر در ایران یهودی بودند.
پیش از انقلاب اسلامی 1979، 80000 یهودی در ایران ساکن بودند و در تهران (60000)، شیراز (8000)، کرمانشاه (4000)، اصفهان (3000) و در همچنین در شهرهای کاشان، تبریز و همدان ساکن بودند.
پیش از تاسیس اسراییل در 1948، در شهر ارومیه 700 خانوار یهودی ساکن بودند که زبان مادری آنان آرامی بود ولی در سال 2006 فقط دو خواهر در ارومیه باقی مانده اند.
انقلاب اسلامی (از 1979)
در زمان تاسیس دولت اسراییل در 1948 حدود 140000 تا 150000 یهودی ایرانی در ایران ساکن بودند؛ و باید به خاطر داشت که ایران مرکز تاریخی یهودیان ایرانی Parsim می باشد. در سال 1979 هنوز 80000 یهودی در ایران ساکن بودند ولی در پی انقلاب اسلامی مهاجرت از ایران به شدت افزایش یافت و به فاصله چندین ماه پس از انقلاب اسلامی حدود 20000 یهودی ایران را ترک کردند. در اواسط و اواخر دهه 80 جمعیت یهودیان ایران در حدود 20000 تا 30000 نفر تخمین زده می شد. در اواسط دهه 90 جمعیت اقلیت یهودی در حدود 35000 تخمین زده می شد و جمعیت کنونی آنان در حال حاضر حدود 40000 نفر می باشد که 25000 آنان در تهران ساکن هستند. علیرغم این مهاجرتهای عظیم که در طی سالیان اخیر روی داده است، ایران در بین کشورهای اسلامی بیشترین میزان جمعیت یهودی را داراست.
امام خمینی(ره) در پی بازگشت از تبعید در پاریس با نمایندگان جامعه یهودیان ایران دیدار کرد و فتوایی صادر کرد تا بر اساس آن از یهودیان ایران حمایت شود. نکته جالب این است که در ایران اسلامی یهودیان مذهبی تر شدند. خانواده هایی که در دهه 70 سکولار شده بودند، شروع به اطاعت از قوانین مذهبی کردند؛ کاشر را رعایت کردند و حرمت شبات را نگاه داشتند. به دلایل بسیاری از رفتن به سینما، رستوران و کافه های عمومی پرهیز کردند و کنیسه ها به مرکز زندگی اجتماعی آنان بدل شد. به گفته هارون یشیایی Haroun Yashyaei، تهیه کننده فیلم و رییس سابق انجمن مرکزی یهودیان ایران: "امام خمینی جامعه ما را با اسراییل و صهیونیسم یکی ندانست- او ما را ایرانی دید." 7
دولت جمهوری اسلامی ایران تلاش بسیار کرد تا بین صهیونیسم که یک نگاه سیاسی سکولار است ولی از نمادهای مذهبی یهودیت استفاده می کند و خود یهودیت که دین موسی(ع) است تفاوت قایل شود.
در 16 مارس 1979 حبیب القانیان که رهبر افتخاری جامعه یهودیان بود به اتهام فساد مالی، ارتباط با اسراییل و صهیونیسم، دوستی با دشمنان خداوند، جنگ با خدا و نمایندگان او و امپریالیسم اقتصادی بازداشت شد. یک دادگاه انقلابی او را محاکمه و به اعدام محکوم کرد. او در 8 مه همان سال اعدام شد. در سال 2000، یک گروه 13 نفره از یهودیان ارتدوکس در شیراز به اتهام جاسوسی برای اسراییل بازداشت شدند. این ماجرا اعتراضات بین المللی را در پی داشت و در نهایت پس از چند سال دیپلماسی پنهان، آنان آزاد شدند8. در سال 2006 داستانی ساختگی در روزنامه نشنال پست National Post باعث جنجال مطبوعاتی عظیمی در دنیا شد. داستان از این قرار بود که مجلس ایران طرحی را در دست بررسی دارد که بر اساس آن اقلیتهای مذهبی در ایران باید نشانی رنگی بر روی لباس خود یپوشند تا از مسلمانان شناخته شوند. مرکز سیمون ویزنتال
Simon Wiesenthal Center هم این ماجرا را تایید کرد9. بعدا مشخص شد که این داستان ساختگی است و مبدع آن هم امیر طاهری، خبرنگار ایرانی تبار سازمان
Benador Associates speakers bureau بود.
علیرغم مخالفت شدید دولت ایران با کشور اسراییل و همچنین تشویقهای انجمن عبری کمک به مهاجرانHebrew Immigrant Aid Society و درخواست مسوولان دولت اسراییل و رهبران جامعه یهودیان آمریکا برای مهاجرت به اسراییل و ترک ایران، یهودیان ایران در این کشور باقی مانده اند؛ و این در شرایطی است که معمولا اجازه سفر به اسراییل و مهاجرت به سایر کشورها داده می شود. بر طبق آمار HAIS بین اکتبر 2005 تا سپتامبر 2006، 152 یهودی ایران را ترک کردند که این کاهش شدیدی را از سال پیش از آن نشان می دهد. زیرا در سال پیش از آن 297 نفر مهاجرت کرده بودند و در سال پیش از آن نیز 183 نفر ایران را ترک کرده بودند. به گفته همین منابع، اکثریت مطلق این مهاجران مسایل مالی و خانوادگی را دلیل ترک ایران ذکر کرده بودند و نه مسایل سیاسی.
شرایط فعلی در ایران
جامعه یهودی ایران به عنوان یک اقلیت دینی در قانون اساسی ایران ثبت شده است و مانند زرتشتیان یک کرسی مجلس به آنان اختصاص دارد. موریس معتمد در سال 2000 به عنوان نماینده یهودیان انتخاب شد و در سال 2004 نیز توانست در انتخابات بعدی این کرسی را حفظ کند.
اکنون تهران 11 کنیسه دارد و اکثر آنها مدارس عبری نیز دارند. دو رستوران کاشر، یک خانه سالمندان و یک قبرستان یهودیان نیز وجود دارد. یک کتابخانه یهودی با 20000 عنوان کتاب نیز وجود دارد. یهودیان ایران روزنامه خود به نام "افق بینا" را منتشر می کنند و محققان یهودی در کتابخانه مرکزی انجمن یهودیان به پژوهشهای خود در زمینه دین یهود می پردازند. بیمارستان یهودی دکتر سپیر بزرگترین بیمارستان خیریه در ایران است که یک اقلیت آنرا نگهداری می کند10؛ گرچه اکنون دیگر اکثر کارمندان و بیماران آن مسلمان هستند.11
تبعیض علیه یهودیان
در حکومتهای مذهبی مانند سایر اقلیتهای حاضر در ایران، یهودیان نیز دچار بعضی تبعیضها می باشند؛ به خصوص در زمینه اشتغال، آموزش و مسکن. به یهودیان پستهای مهم در دولت و یا ارتش داده نخواهد شد و از اشتغال در قوه قضاییه و نیروهای امنیتی باز داشته شده اند و امکان انتصاب آنان به عنوان مدیر مدرسه وجود ندارد.
جو ضد اسراییلی ، به همراه این تفکر بعضی مسلمانان که همه یهودیان از اسراییل حمایت می کنند، گاه باعث یه وجود آمدن جوی ضد یهودی شده است. در سال 2004، اکثر روزنامه های ایرانی در یکصدمین سال انتشار کتاب مجعول و ضد یهودی "پروتکل بزرگان صهیون" مقالاتی در باب خطر صهیونیسم منتشر کردند. یهودیان گاهی هدف کاریکاتورهای روزنامه های ایران می شوند. در بسیاری موارد نیز رهبران جامعه یهودی توجه مسوولان را به سوءرفتارهای اعمال شده جلب نمی کنند.
گرچه در اقدامی بی سابقه، تنها عضو یهودی مجلس، موریس معتمد، اقدام دولت در برگزاری نمایشگاه کاریکاتور درباره هولوکاست را به شدت محکوم کرد. او همچنین نامه ای به آقای رییس جمهور نوشت و اعتقاد او را در نفی هولوکاست زیر سوال برد و آنرا "توهین بزرگی به همه یهودیان دنیا" دانست.
برطبق سیستم قضایی ایران اقلیتهای مذهبی در هنگام جرح و یا فوت دیه بسیار کمتری از مرد مسلمان دریافت می کنند.12
یهودیان در برگزاری مراسم مذهبی خود تقریبا آزاد هستند؛ گرچه حوزه آموزش دچار مشکلاتی می باشد. دولت ایران آموزش زبان عبری را مجاز می داند، زیرا دانستن آن برای برگزاری بسیاری از مراسم یهودی الزامی است. ولی چاپ و گسترش متون عبری بسیار محدود است؛ که این در عمل آموختن زبان عبری را دشوار کرده است. علاوه بر آن، بسیاری از مدارس یهودی در هماهنگی با سیستم آموزشی کشور در روز شنبه، شبّات، باز می مانند و کلاسها دائر هستند. از آنجا که کار کردن و یا به کلاس رفتن در روز شبّات ناقض قوانین یهودی است، این الزام باعث شده است که یهودیان مذهبی با به کلاس رفتن، حرمت شبّات را بشکنند.
با آنکه استعمال الکل در ایران حرام است ولی بر طبق منابع تایید نشده به اقلیتها اجازه تولید و مصرف مشروبات الکلی داده شده است.شهروندان یهودی اجازه داشتن پاسپورت و سفر به خارج را دارند؛ گرچه به استثنای بعضی مسافرتهای تجاری، سایر یهودیان باید اجازه رسمی از دولت دریافت کنند و مبلغ بیشتری هم هزینه کنند. دولت ایران نگران مهاجرت یهودیان می باشد و معمولا اجازه خروج به همه اعضای یک خانواده در یک زمان داده نمی شود.
ارتباط با یهودیان خارج از ایران
یهودیان ایران اجازه برقراری رابطه با جوامع یهودی خارج از ایران را ندارند، مگر اینکه آنها با موجودیت اسراییل ستیز داشته باشند؛ مانند نتوری کارتاNeturei Karta . خاخامهای این فرقه بارها به ایران سفر کرده اند.
سفر به اسراییل برای تمام شهروندان ایران ممنوع می باشد و این مساله مشخصا در صفحه آخر گذرنامه اتباع ایران ذکر شده است. اگرچه به گفته موریس معتمد در سالهای اخیر، دولت ایران اجازه داده است تا شهروندان یهودی با اعضای خانواده خود در اسراییل دیدار کنند و همچنین دولت به ایرانیان ساکن اسراییل اجازه داده است تا به ایران برای ملاقات اعضای خانواده خود بیایند.
به تماسهای فرهنگی محدود اجازه داده می شود، مانند مارس 2006 که به یک تیم زنان یهودی ایران اجازه داده شد تا در فستیوال رقصهای محلی یهودی در روسیه شرکت کنند.
مراکز یهودیان ایران
اکثر یهودیان در حال حاضر در پایتخت، تهران، زندگی می کنند و در سال 1996 سه کنیسه فعال بود، گرچه از همان سال نیز در ایران خاخامی وجود ندارد. به طور سنتی شهرهای شیراز، اصفهان، بابل، همدان و نهاوند دارای سکنه یهودی قابل توجهی بودند. قبرستان یهودیان در جنوب تهران برای ساخت یک پروژه ساختمانی تخریب شده است.13 در حال حاضر در سراسر ایران 25 کنیسه وجود دارد.
آموزش یهودی در ایران
در سال 1996،در تهران هنوز مدارسی وجود داشت که یهودیان در آنها در اکثریت باشند ولی مدیران یهودی تعویض شده اند. برنامه آموزشی تحت تاثیر برنامه آموزشی اسلامی قرار دارد و کتاب مقدس Tanakh نیز به فارسی، و نه به عبری، آموزش داده می شود. سازمان Ozar Hatorah روزهای جمعه کلاس عبری برگزار می کند. شنبه دیگر به عنوان شبّات تعطیل نیست و دانش آموزان یهودی اجبارا باید در مدرسه حاضر شوند.
جاذبه های دیدنی یهودی ایران
تقریبا هر شهر قدیمی ایران دارای مکانی قدیمی یهودی، زیارتگاه و جاذبه توریستی یهودی می باشد. معروفترین آنها مقبره استر و مردخای و حیقوق در همدان، مقبره دانیال در شوش و پیغمبریه در قزوین است. معمولا مسلمانان برای زیارت به مزار دانیال نبی می روند.
مزار چندین تن از بزرگترین علماء یهود در ایران است؛ مانند Harav Uresharga در یزد و خاخام ملا موشه ها لِوی Hakham Mukkah Moshe Halevi (Moshe-Ha-Lavi) در کاشان که حتی زایران مسلمان نیز بدین مکانها می روند.
یهودیان ایرانی در خارج از مرزهای ایران
جوامع یهودی ایرانی در خارج از ایران بسیار بیشتر آسیب دیده اند. پس از تهاجم ارتش سرخ شوروی در 1979 به افغانستان، اکثر یهودیان از آن کشور خارج شدند و علی الظاهر تنها یک یهودی در افغانستان باقی مانده است. در قزاقستان تنها چند خانواده یهودی باقی مانده اند که آرامی صحبت می کنند و خود را لخلوخ Lakhloukh می نامند. آنها هنوز اوراق هویت ایرانی دارند. اجداد آنها در حدود 80 سال قبل از ایران فرار کرده اند.14 یهودیان ایرانی ساکن هند از آزار به دور مانده اند و جزو یهودیان بغدادی به حساب می آیند. یهودیان ایرانی قرنها در منطقه کوچ و همچنین در بمبئی ساکن بوده اند ولی اکثریت مطلق آنان پس از تاسیس اسراییل به آن کشور مهاجرت کرده اند.
در ایالات متحده آمریکا، به خصوص در دو ایالت کالیفورنیا و نیویورک تعداد زیادی از یهودیان ایرانی ساکن هستند. بسیاری از آنها در بورلی هیلز Beverly Hills در لس آنجلس زندگی می کنند. یر طبق بعضی تخمینها حدود 25 تا 50 درصد ساکنان بورلی هیلز ایرانی هستند، و اکثر آنان یهودی می باشند؛ بدین ترتیب آنان یهودیان ایرانی-آمریکایی هستند. بر طبق مقاله ای 8000 نفر از 35000 نفر سکنه بورلی هیلز ایرانی می باشند. در 21 مارس 2007، جیمی دلشاد در رای گیری که با برگه های دو زبانه فارسی و انگلیسی یرگزار شد به عنوان شهردار بورلی هیلز انتخاب شد. بدین ترتیب او بلندپایه ترین مقام ایرانی-آمریکایی می باشد.
در اسراییل یهودیان ایرانی در طبقه بندی Mizrahim قرار می گیرند. رییس جمهور اسراییل، موشه کاتساوMoshe Katsav ، و وزیر سابق دفاع و وزیر کنونی حمل و نقل، شاول موفاز
Shaul Mofaz، اصالتا یهودی ایرانی می باشند.
یهودیان ایرانی مشهور
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Bahram V پادشاه ساسانی مادر او یهودی بود(421–438).
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Dan Ahdoot کمدین
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Jonathan Ahdout بازیگر
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Sa'ad al-Dawla سعد الدوله پزشک و سیاستمدار
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Rashid al-Din رشید الدین پزشک، سیاستمدار و نویسنده
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David Alliance بازرگان بریتانیایی و سیاستمدار حزب لیبرال دمکرات
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Daniel Biblical character of the نویسنده کتاب دانیل
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Richard Danielpour آهنگساز
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Esther قهرمان کتاب استر
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Hacham Uriel Davidi رهبر مذهبی
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Soleiman Haim او از اولین افرادی بود که فرهنگ لغت دو زبانه نوشت
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Roya Hakakian نویسنده
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Dan Halutz رییس ستاد مشترک ارتش اسراییل
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Moshe Katsav رییس جمهور اسراییل
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Rita Kleinstein خواننده
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Isaac Larian CEO شرکت MGA
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Shaul Mofaz وزیر حمل ونقل در کابینه دولت فعلی اسراییل
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Mordechai قهرمان کتاب استر
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Maurice Motamed عضو یهودی مجلس
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Gina Nahai نویسنده
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Benjamin Nahawandi دانشمند قرون وسطی
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Subliminal موسیقیدان و نوازنده تار
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Bahar Soomekh بازیگر
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Tami Stronach طراح رقص
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Lotfi Zadeh ریاضیدان و متخصص کامپیوتر
منابع
1.
http://www.dangoor.com/TheScribe58.pdf2.
http://www.sephardicstudies.org/iran.html3.
http://www.cais-soas.com/CAIS/History/ashkanian/parthian.htm4.
http://en.wikipedia.org/wiki/Persian_Jews5.
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http://en.wikipedia.org/wiki/Persian_Jews7.
http://www.csmonitor.com/durable/1998/02/03/intl/intl.3.html8.
http://www.forward.com/articles/iranian-jews-reject-outside-calls-to-leave9
. http://thejewishweek.com/news/newscontent.php3?artid=1251110
. http://www.persianrabbi.com/content/view/74/211.
http://news.bbc.co.uk/2/hi/middle_east/5367892.stm12.
http://www.state.gov/g/drl/rls/irf/2004/35497.htm13.
http://en.wikipedia.org/wiki/Encyclopaedia_Judaica14.
http://en.wikipedia.org/wiki/Encyclopaedia_Judaica
بررسی ملیت و قومیت ایرانیان و سرزمینهای حقیقی ما
واژه ملیت و قومیت ( که میتوان به جای قومیت تیره ها یا اقوام هم گفت ) متاسفانه در برخی افراد به اصطلاح روشنفکر ایرانی یکی خوانده می شود . این دو واژه به هیچ وجهه به یک معنی نمی باشند و حتی جا انداختن این اشتباه بزرگ در میان افراد جامعه بسیار هولناک و غیر قابل گذشت می باشد . در برخی مکانهای عمومی مانند کانالهای اپوزوسیون خارج از کشور برای اقوام ایرانی به غرض یا از روی ناآگاهی ملیت به کار برده می شود . پروژه ملیت سازی برای اقوام ایرانی حربه ای قدیمی و استعماری برای کشور گسترده و اهورایی ایران زمین است . وحشت از به قدرت رسیدن ایران , کوتاه کردن دست بیگانگان از سرمایه های هنگفت ایران , متحد شدن تیره های ایرانی و تشکیل یک اتحادیه یا کنفدراسیون بزرگ با وجود تمامی اشتراک ادیان , باورها , فرهنگ و آداب و رسومی که در مناطق اطراف ایران جاری است و زنده کردن سرزمینهای کوروش بزرگ ابر مرد آزادی بخش گیتی و نام بزرگ ایران و ملت دلاور و فرهنگ پرورش در جهان از عوامل تفرقه و ساخت ملیت های جداگانه توسط بیگانگان برای ایران است . سرزمینهای حقیقی ایران بیش از سه برابر ایران کنونی ماست و با همین شیوه در گذشته های نچندان دور از بدنه اصلی ایران برای تضعیف آن و چپاول سرمایه هایش جدا شده است . متاسفانه همه این وقایع در زمانی رخ داده است که ملت ایران گریبانگیر حکومتهای فاسد , ناآگاه , وطن فروش , هرزه و بی دانش بوده است و خود ملت هم با واژه میهن و ایران به راستی بیگانه بوده اند . پس از جدا شدند هفده شهر قفقاز ایران هیچ صدای اعتراضی در ایران به گوش نمی رسد ولی امروز با کوچترین تحرکات ضد ایرانی بیگانگان در فیلم سازی هایشان , اخبارهایشان و . . . ملت ایران برافروخته می شوند و صدای اعتراضات خود را به جهان می رسانند و آنان را مجبور به عذر خواهی میکنند . این خود نشان از آگاهی ملت ایران دارد و اینکه دیگر اجازه چنین حرکات اهریمنی را به آنان نمی دهند .
برای نمونه چند مورد از این تحرکات اهریمنی بیگانگان در چند سال اخیر و پاسخ ملت ایران را بررسی میکنیم :
1 ) جعل گسترده و سیاسی نام همیشه جاوید خلیج فارس توسط موئسسه نشنال جئوگرافی آمریکا . تظاهرات ها و برگشت نقشه های این موئسسه , نامه از تمامی نقاط جهان بر ضد این حرکت غیر قانونی و مجبور کردن آنان به نوشتن نام حقیقی آن در نقشه های جهان . بیشتر . . .
2 ) جعل نقشه تبریز ایران در سایت جهانی گوگل و وصل کردن آن به ایران شمالی ( جمهوری آذربایجان ) . اعتراضات گسترده ایرانیان به گوگول و اصلاح آن .
3 ) ساخت فیلم موهن و ضد ایران 300 در جهت وحشی قلمداد کردن ایرانیان در تاریخ . سیل نامه ها , اعتراضات ایرانیان روانه سازمان یونسکو , کمپانی برادران وارنر, هالیوود و دولت آمریکا و بایکوت کردن این فیلم دروغین و سیاسی می شود . بیشتر . . .
4 ) مصادره کردن کتیبه های 2500 ساله ایران که برای رمز گشایی به دانشگاه شیکاگو امانت داده شده بود و آنان اقدام به حراج آن نمودند . شکایت ملت و دولت ایران بر ضد این حرکت غیر قانونی و غیر انسانی .
5 ) ایجاد یک نمایشگاه غیر واقعی از ایرانیان باستان تحت نام امپراتوری شیطانی که در انگلستان برپا شد . سیل نامه ها و اعتراضات از سوی ایرانیان روانه برپا کنندگان این شو سیاسی شد .
6 ) ادعاهای واهی مالکیت اعراب بر جزایر سه گانه ایران زمین . اعتراضات گسترده ملت ایران بر ضد اعراب .
7 ) اتحاد کشورهای عربی , انگلستان , آمریکا , فرانسه در جنگ با ایران در زمان صدام حسین گجستک و پاسخ ایرانیان در 8 سال نبرد نا برابر . بیشتر . . .
و دهها مورد دیگر که بر ضد این ملت و این سرزمین کهن اعمال شده است . پس این کشورها باید بدانند دوره ننگین قاجار به پایان رسیده است و ملت ایران نه تنها اجازه کوچترین دست درازی به این سرزمین اهورایی را نمی دهند بلکه گروه های بسیاری در اندیشه متحد شدن شهرهای قفقاز و کردستانات خود هستند . حرکتی که باید روزی عملی شود و به همه نقشه های بیگانگان بر ضد ایران پایان داده شود . بیگانگان و در صدر همه آنان کشور اهریمنی انگلستان به راستی پرچم دار تفرقه در میان ملت ایران بوده است و امروزه هم تلاشهای گسترده ای برای به حقیقت پیوستن این تفکر فاشیستی در ایران می نماید . روس و آمریکا پس از انگلستان بزرگ ترین حامیان این تفرقه افکنی در میان ملت ایران بوده اند . این کشورها با ایجاد یک اندیشه عقب افتاده , قرون وسطیی و قبیله پرستی در جامعه ایران برای رسیدن به آرزوهای خود گام بر می دارند . در برخی موارد مردم عوام و ناآگاه و در برخی دیگر عوامل دست نشانده و نفوذی خود مسئول گسترش این اندیشه واپس گرا می شوند . چند نمونه از این گروه های ضد ایرانی بیگانه پرست و منفور ملت ایران که متاسفانه امروزه با وقاحت تمام خودنمایی میکنند به شرح زیر می باشند :

گروهک متحجر پان ترکیسم : پان ترکیسم بر پایه اندیشه ای واپس گرا , متحجر , شوونیزم کودکانه و در دامان بیگانگان رفتن بنا گشته است که با حرکات نمایشی و جعل تاریخ برای رسیدن به اهداف خود گام بر می دارد .واژه پان ترکیسم تشکیل شده است از پان + ترکیسم به معنی طرفداران ترکستان رویایی و بزرگ است . آنها برای ایجاد یک کشور غیر واقعی با ترکمستان , آذربایجان قفقاز , آذربایجان ایران و ترکیه کوشش میکنند . ترکیه که خود در مرز فروپاشی قرار دارد و اگر روزی کردستانهای ایرانی به بدنه ایران بپیوندند چیزی دیگر از ترکیه به جز کشوری کوچک و گمنام باقی نخواهد ماند . مرزهای غیر واقعی ترکیه از دوره امپراتوری عثمانی باقی مانده است و روزی بدون شک سرزمینهای ایران از آن آزاد خواهد شد . کشور ترکمستان نیز که یکی از 17 شهر قفقاز ماست و در آن سوی دریای مازندران واقع شده است و قدرت اتصال به آذربایجان قفقاز را ندارد و خود در فقر و اقتصاد ضعیف دست و پنجه نرم میکند . می ماند جمهوری آذربایجان که آنهم ملت ایران با نام ایران شمالی می شناسند و در واقع غیر مشروع بودن آن از سوی ملت ایران تائید شده است . این صداهای ملت ایران به جایی رسید که مقامات دولتی باکو در ایران شمالی دست به ساخت فیلمهای مستند از ایران زدند و ایران را افتخار آذربایجان دانستند و حتی فردوسی بزرگ را که دشمن خود می دانستند در این فیلم به عنوان پدر آذربایجان نامیدند .( به تاریخ 2007/03/13 شبکه آذ تی وی آذربایجان) . پس با یک اندیشه واقعی می توان پی برد که چنین رویایی محال و غیر ممکن است . از یک سو هیچ یک از این کشورها قدرت رویارویی با ایران که مرکز قدرت خاورمیان است را ندارند و از سوی دیگر ملت ایران و حتی خود مردم نیک سرشت آذربایجان اجازه چنین کاری را هرگز نخواهد داد . شعار پان ترکیسم به راستی مایه تمسخر ملت ایران و جهانیان است . آنان با شعار ملت فارس ( که اصلا وجود خارجی ندارد ) , ایران کشوری وحشی و با تاریخی بدوی ( امری که صدها تاریخ نگار بزرگ جهانی آن را رد کرده اند ) , ملت ترک ایران را بنا کردند ( ملت ترک در ایران وجود خارجی ندارد , مردم آذری ایران بودند که در صحنه های مهم ملی کوششهای بسیاری برای ایران زمین کردند ) و . . . که همگی بر بیناد دروغ , عوام فریبی و بیگانه پرستی پایه گذاری شده است . پرچم دار این گروه مضحک نیز "سید جعفر پیشه وری" مزدور ضد ایرانی بود که در دامان روسها قرار داشت و حتی اعتبار نامه اش در مجلس ملی ایران برای وابستگی به روسها رد شد . پس از معدوم شدن وی و حکومت ننگین اش که کمتر از یکسال دوام آورد میتوان پنداشت که در عمل این گروه هم جز سخنهای هجو و نمایشهای کودکانه حرفی برای گفتن ندارد . یکی از نشانه های این گروهک مضحک علامت دادن با انگشتان دستشان است که در تصویر بالا دیده می شود و بایستنی است در هرکجای این کشور که چنین نشانه ای را مردم مشاهده کردند با آن برخورد نمایند .
گروهک تروریستی پان عربیسم : پان عربیسم گروهکی منحل شده و در حقیقت متلاشی شده است . پدر این اندیشه فاسد و واپسرگرا صدام حسین گجستک بود که در سال 85 شاهد اعدامش بودیم . صدام حسین بنیان گذار اتحادیه کشورهای عرب با عراق بود . به همین روی با اتحاد آمریکا و انگلستان برای تصاحب خوزستان و منابع سرشار نفتی آنجا اقدام به حمله نظامی به ایران کرد که به راستی رشادتها یک میلیون ایرانی شهید و میلیونها جانباز و شیمایی راه گشایی ملت ایران شد و امروز هر چیزی که برای ما باقی مانده است حاصل ایمان و وطن پرستی آنان است . صدام حسین یکی دیگر از بنیان گذاران جعل نام دریای پارس ایران بود که تلاشهای گسترده ای برای به حقیقت پیوستن این امر نمود ولی همگی نقش بر آب شد . صدام حسین این اهریمن و دیکتاتوری بزرگ در واپسین لحظات زندگی ننگین اش پیش از رفتن به چوبه دار فریاد زد مرگ بر ایران و ایرانی . ولی او نیز مانند اسکندر و تیمور و چنگیز رفت و ایران و ایرانی باقی ماند . باقی مانده این گروه عقب افتاده به نام الاهوازی در خوزستان ایران با پشتوانه انگلستان هر چند سال یک بار دست به عملیات تروریستی می زند که نه تنها مردم خوزستان از آنها پشتیبانی نمی کنند بلکه دولت هم با برخورد جدی آنان را از کارهایشان مایوس میکند . بدون شک هر دولتی و هر نظامی در ایران روی کار باشد با پان ترکیسم و پان عربیسم و دیگر گروهای ضد ایران برخورد جدی و کوبنده خواهد کرد . عده دیگر از کسانی که به همین اندیشه وابسته هستند امروزه در خوزستان مشغول به فعالیت های زیر زمینی هستند و با نام موهن جبهه دموکراتیک خلق عرب مشغول به ایجاد فتنه انگیزی های قومی و منطقه ای و عملیات تروریستی در خوزستان می باشد .
گروهک تروریستی جندالله : جند الله گروهکی وهابی افراطی قومی است که برای تفرقه میان ملت ایران و اندیشه های مذهبی ( شیعه و سنی ) کوشش میکند . جند الله بارها با پشتوانه انگلستان و کشور پاکستان در بلوچستان ایران دست به اقدامات تروریستی زده است . هدف اصلی و البته رویایی این گروه متلاشی کردن ایران و اتصال بلوچستان ایران به بلوچستان پاکستان یا کشوری به نام بلوچستان است . هدفی که انگلستان در 150 سال پیش دنبال می کرد و برای رسیدن به این هدف حتی مجبور به لشگر کشی به این منطقه شد و چند سالی هم خاکهای ایرانی بلوچستان به نام "بلوچستان انگلستان" نامیده می شد . در نهایت انگلستان موفق به جدا کردن بخش زیادی از خاک بلوچستان از ایران شد و کشوری غیر واقعی به نام پاکستان برپا شد . به همین جهت برای ادامه این نیت شوم خود امروزه در کوشش برای دست یافتن به ادامه اهداف ننگین خود است . ولی روزگار 150 سال پیش ایران و ملت ایران با امروز هرگز قابل مقایسه نیست و چنین رویایی هرگز برای انگلستان و فرزندش پلیدش جندالله به واقعیت نخواهد پیوست . امروزه رهبری این گروهگ منفور به دست شخصی به نام عبد المالک ریگی است که رسما در مصاحبه های تلوزیونی وابسته بودن خود به انگلستان را اعلام کرده است . تصویر این انیرانی در بالا دیده می شود .

گروهک مجهادین خلق : گروهک مجهاهدین خلق که به منافقین نیز مشهور هستند پس از روی کار آمدن انقلاب 57 با دولت وقت بر سر اصول اساسی مشکل پیدا کردند و رسما از دولت و حکومت بیرون رانده شدند . این افراد از یک سو در جنگ تحمیلی عراق بر ضد کشورمان به دامن دشمن ملت ایران پناه بردند و از صدامی که میلیون ها تن از هم میهنشانشان را کشته و مجروح کرده بود و مرزهای غربی ایران را با خاک یکسان نمود بود حمایت کردند . از سوی دیگر در کشتار 180 هزار نفر از کردهای ایرانی نژاد ساکن شمال عراق با یاری صدام گجستک نقش اساسی ایفا نمودند و این ننگ تاریخی را با خود به یدک می کشند . اینان با بمب گذاری و حرکات نظامی برای رسیدن به اهداف خود کوشش میکنند . مجاهدین امروزه از سوی کشور عربستان و آمریکا بر ضد ایران حمایت مالی می شوند .
یکپارچگی هزاران ساله ملت ایران
ملت ایرانی در طول تاریخ نشان داده است که هرگز در جستجوی قومیت خود نبوده اند . تا پیش از توطئه های انلگستان و ایجاد گروهکهای ضد ایرانی جهت تفرقه و اغتشاش در میان تیره های ایرانی , این امر به راحتی قابل بررسی است :
در آغاز حکومت قدرتمند اشکانیان توسط ارشک و تیرداد پارتی در سالهای حدود 250 قبل از میلاد نیز شاهد این امر هستیم . این دو سردار دلیر خود را پادشاه خراسان نمی دانند و خود را فرمانروایی سرزمینهای بزرگ ایران می شمارند و از این جهت که ایران را از حالت متلاشی دوره سلوکی بیرون آورند به خود می بالند . این امر در حکومت ساسانیان ( آغاز 241 پس از میلاد ) که از استان پارس بودند نیز صادق است .
در 500 سال گذشته، همهي سلسلههاي پادشاهي كه هركدام به قوم خاصي تعلق داشتهاند، هرگز بهفكر تشكيل دولت قومي-زباني خاص خويش نيفتادهاند و همواره اولين هدفشان تأمين وحدت سرتاسري ايران و ايجاد دولت واحد ايران بودهاست؟ دولت صفويه از ترک زبانان اردبيل بهپا ميخيزد و شاه اسماعيل تا پايش به تبريز ميرسد خود را پادشاه ايران ميخواند و نه پادشاه آذربايجان؟ اولين اقدام او جنگ با تركان عثماني ميشود؟ و خود وي و جانشينانش بهخاطر تماميت ارضي و استقلال ايران با ازبكها و باز با تركهاي عثماني به نبرد بر ميخيزند؟
چهگونه است كه صفويهي آذريتبار، بدون دودلي، پايتخت خود را از اردبيل به تبريز و از آنجا به قزوين و سرانجام به اصفهان منتقل ميكند و شاهعباس از اصفهان است كه نصفجهان ميسازد نه از اردبيل يا تبريز؟ و تمام هموغم او سرافرازي ملت ايران است نه يك ايالت و قوم خودي؟
رفتار و هنجار قبايل افشار و قاجار نيز بر همين روال است. نادرشاه از خراسان و آغامحمدخان قاجار از استرآباد برخاستند و در تاريكترين لحظات تاريخ ايران، تا دم مرگ در راه استقلال و براي حفظ تماميت ارضي ايران جنگيدند و عجبا كه قاجار نيز تهران را پايتخت خود قرار ميدهد و دچار وسوسهي موهن و واپسگرای محليگري و قومگرايي نميشود؟ كريمخان زند لُرتبار، پايتخت خود را شيراز قرار ميدهد و نه بروجرد. خود را وكيلالرعاياي ايران ميخواند نه لرستان؟ پاسخ همهي آنان بيگمان، در بازتاب احساس تعلقشان به ملت ايران است. مردان بزرگ ما، عليرغم عشق به هويت قومي و ايليشان، خود را متعلق به ايران ميديدند و نه به يك قوم خاص و معيّن!
حال چه شده است که برخی افراد در آستاده قرن 21 که همه کشورها پیش به سوی اتحادی منطقه با یکدیگر می روند - بازیچه سیاستهای انلگستان شده اند و دست به نوشتن مقالات قوم گرایانه و واپسگرا و زبان محوری می زنند . اینان افراد به دنبال جمع آوری مشاهیر برای شهر و قوم خود هستند نه برای کشورشان و نه برای منطقه شان . به زبان محلی خود می اندیشند نه به زبانی که 70 میلیون فقط در داخل ایران و میلیون ها نفر دیگر در فلات ایران به آن سخن می گویند . برخی از این افراد که در اجرای سیاستهای استعماری بیگانگان ناتوان مانده اند امروز سخن از فدرالیزم برای کشوری می زنند که هزاران سال است دوش تا دوش یکدیگر ایستاده اند
, جنگیده اند , شادی و سوگواری کرده اند . این افراد حکومتهای فدرال آمریکا , سوئیس و آلمان یا کانادا را برای توجیه اندیشه خود می آورند ولی هرگز نمی اندیشند که آلمان برای اتحاد آلمان شرقی و غربی حکومت فدرال تشکیل داد . آمریکا برای هزار و یک مللی که به خاک آمریکا مهاجرت کرده اند فدرالیزم را بنا کرد . سوئیس پس از پذیرفتن چندین ایالت منجمله : سن گال، مناطق گريزوفنر ، آرگووي ، تسن و دوود و . . . فدرالیزم شد . کانادا یکی از کشورهای زیر نفوذ بریتانیای کبیر است و به همین جهت با قوانین فدرالیزم اداره می شود . سخن گفتن از ملیت برای اقوام ایران به راستی موجب شگفتی و تاسف در میان آگاهان تاریخ و فرهنگ و تمدن می شود . امروزه کشورهایی که خود نام ملت را به یدک میکشند و هرگز از یک نژاد تاریخ و فرهنگ مشترک نیستد از این واژه ملل یا ملیتها برای کشور واحد خود استفاده نمی کنند . آمریکا کشور هزار و یک ملل نام دارد ولی هرگز نام ملل را برای ایالتهای خود به کار نمی برد . در قانون اساسی اش از ملتهای آمریکا یاد نمی کند . به همین شکل فرانسه که میلیون ها عرب را در خود جای داده است و . . .
پس حال باید بررسی نماییم که به راستی معنی حقیقی ملیت و قومیت چیست ؟
هر ایرانی که معنی درست و حقیقی این دو واژه را درک کند بدون شک کوشش و تلاشهای گسترده خود را معطوف ایران قدرتمند و مرزهای حقیقی ایران بزرگ خواهد کرد و دقیقا عکس آن نیز صادق است . به صورتیکه اگر معنی درست قومیت و ملیت را نداند برای نابودی ایران و تمدن ایرانی کوشش میکند . امری که به ظاهر ممکن است به چشم مهم نیاید ولی نکته ای بسیار پرمعنی و مهم است . کوروش بزرگ به راستی می دانست که اگر در طول سالهای حیاتش دست روی دست بگذارد بدون شک بیگانگان از همه سوی بر کشورش یورش خواهد آورد . به همین روی اتحادیه بزرگ و شگفت انگیزی از سرزمینهای ایران بنا کرد و دست متجاوزانی که هر ساله ایران را مورد تاخت و تاز قرار می دادند کوتاه کرد . اتحادیه ای بر پایه انسان محوریت , بر پایه احترام بر ادیان هر منطقه , آزادی زبان و گویشهای برای هر منطقه و پیشرفت و ترقی روزافزون برای ملت ایران که متاسفانه امروز در قرن 21 کمتر شاهد آن هستیم . دست یافتن به اتحادیه و مرزهای ایران بزرگ در روزگار امروز غیر واقعی به نظر می رسد . ولی تشکیل اتحادیه اقوام ایرانی امری ضروری و ممکن است . پیش از تشریح این اتحادیه بزرگ اقوام ایرانی نیازمند بررسی واژه ملیت و قومیت هستیم تا برای این سخن سند ارائه دهیم :
ملت : واژه Nation به معنای ملت – از واژه لاتین Natus به معنای تولد گرفته شده است . به این معنا که ملت به خاستگاه و ريشههای و بهطور كلي تبار مشتركي دلالت دارد، بهگونهاي كه اين تبار، از جمعي پراكنده، كالبدي واحد پديد ميآورد . به مجموعه افرادی ملت گفته می شوند که با یک پیشینه نژادی تشکیل یک کشور واحد می دهند . پس زبان , گویش , آداب و رسوم و نوع لباس پوشیدن هر منطقه هیچ ارتباطی با ملیت ندارد . هرزگاهی در رسانه های ماهواره ای شنیده می شوند که به جای استفاده از واژه اقوام از ملت استفاده می شود . برخی از این افراد که با القاب استاد و دکتر و متخصص تاریخ چنین سخنانی می گویند یا فاقد هرگونه دانش کافی برای سخن گفتن هستند یا وسیله ای در دست بیگانه می باشند . برای مثال میگویند ملت آذربایجان , ملت خوزستان , ملت کردستان . واژه ملت برای کردستان امری غیر واقعی و حتی مضحک است . این افراد خواسته یا ناخواسته راهی را می روند که انگلستان در جستجوی آن بود تا برای اقوام ایرانی ملیت سازی کند و کشورهای جعلی و کوچک بسازد . کرد , فارس , لر , بلوچ , آذری و . . .همگی از دیدگاه پیشینه نژادی آریایی هستند . زبان ایرانی پهلوی در آذربایجان , کردستان , بلوچستان همگی در کتب تاریخی بارها و بارها ذکر شده است . نژاد آریایی اقوام ماد که امروزه کردستان و آذربایجان را تشکیل می دهد نشان از یکی بودن این اقوام ایرانی دارد . پس به کار بردن واژه ملیت برای این شهرها 100% غیر واقعی است . پیشینه نژادی همه این شهرها از نسل آریایی های کهن ایران زمین گرفته شده است .
اقوام : به مجموعه افرادی که در هر منطقه دارای اشتراک زبان ( گویشها و لهجه های مختلف ) , شیوه لباس پوشیدن و فرهنگ خاص منطقه ای هستند قومیت گفته می شود . قومیت های مختلف که دارای پیشینه نژادی یکسان باشند تشکیل ملت را میدهند . پس گویش خاص هر منطقه , شیوه لباس پوشیدن , آداب و رسوم همگی نشان از اشتراک قومیت آن منطقه دارد . در تمامی واژه نامه ها و فرهنگ نامه ها به راحتی می توان بر این ادعا پی برد . اقوام آریایی ایران که فلات گسترده ایران را برای مسکن خود انتخاب نمودند به دوازده قسمت عمده تقسیم شدند که نام برخی از آنان در اوستا آمده است :
1 ) مادها در شمال غربی ایران - شامل کلیه قسمتهای آتروپاتکان (آذربایجان) - آران و قفقاز ( جمهوری آذربایجان) - کلیه شهرهای کرد نشین ترکیه و عراق و سوریه .
2 ) پارس ها در جنوب ایران
3 ) هیرکانیها در استرآباد ( گرگان امروزی )
4 ) پارتها در سرزمین خراسان بزرگ
5 ) آریانها در مجاورت رود هریرود ( آریوس )
6 ) درانگیان در شمال غربی افغانستان کنونی
7 ) آراخوتیان در ناحیه رود هلمند و شاخه های آن در اطراق قندهار در افغنستان کنونی
8 ) باکتریان در دامنه های شمالی هندوکش تا کنار جیحون که همان بلخ امروزی در افغانستان است
9 ) سغدیان در ناحیه کوهستانی میان جیحون و سیحون
10 ) خوارزمیان در گستره خیوه
11 ) ماژگیان در کنار رود مارگوس یا مرغاب که بیشتر در گستره مرو واقع در ترکمنستان کنونی است .
12 ) ساگاژتیان واقع در زاگرس شرقی که در سرزمینهای پهناور شمال دریای مازندران ( کاسپین ) زندگی میکنند .
در فرهنگ دهخدا آمده است آری یا آریا نام ایالات قدیم ایران بوده است و نام کرسی آن در قدیم آرتا کوآنا بوده است . اسکندر گجستک شهری به نام اسکندریه آره ایا در کنار رود هری رود بنا کرد . ( در اطراف هرات امروزی )
مولانای بلخی فیلسوف ایرانی و پدرعرفان جهان :
همزبانی خویشی و پیوندی است مرد با نامحرمان چون بندی است
ای بسا هندو و ترک همزبان ای بسا دو ترک چون بیگانگان
پس زبان محرمی خود دیگر است همدلی از همزبانی خوشتر است
استاد شهریار پیرامون تفاوت گویشهای ایرانی چنین گفته است :
اختلاف لهجه ملیت نزاید بَهر کس ملتی با یک زبان کمتر به یاد آرد زمان
گر بدین منطق ترا گفتند ایرانی نئی صبح را خواندند شام و آسمان را ریسمان
بی کس است ایران ، به حرف ناکسان از ره مرو جان به قربان تو ای جانانه آذربایجان
هیچگاه تکلم به یک زبان ، از متکلمان به آن زبان ، «ملت» نساخته است این یک قانون کلی است و نمونهء روشن و مشهور آن زبان انگلیسی است که در 5 قارهء جهان در کشورهای گوناگون متشکل از ملت ها و اقوام و نژاد های گوناگون به آن تکلم می شود اما هیچ کس این انگلیسی زبانان را «ملتِ انگلیس» خطاب نمی کند . هندیان ( که طی چندین قرن زبان رسمی شان فارسی بود و اکنون انگلیسی زبان شده اند) ، جزو ملت هندند و هنگامی هم که به فارسی سخن می گفتند هندی بودند و افریقای جنوبی ها از ملت آفریقای جنوبی هستند و استرالیائی ها و کانادائی ها جزء ملت استرالیا یا کانادا به حساب می آیند . پس همین انگلیسی ها با ایجاد چنین گروهایی ( پان ترکیسم , پان عربیسم و جندالله ) برای خاورمیانه در تلاش برای غارت تاریخ و تمدن و ثرمایه های ملی و مانع شدن از ایرانی بزرگ و قدرتمند هستند . با نگاهی به 200 سال اخیر همگی پرسشهای گنگ در اذهان ملت ایران پیرامون این قضایا پاسخ داده می شود :
پس حال پرسشی در ذهن هر ایرانی مطرح می شود که چرا امروزه اقوام ایرانی در ایران خود زندگی نمیکنند ؟ پاسخ :
1 ) حمله انگلستان به بلوچستان ایران و اشغال این منطقه و سپس جدا کردن بلوچستان ایران و اتصال آن به پاکستان در حدود 150سال پیش . جدا شدن بخش زیادی از اقوام آریایی بلوچ ایران توسط انگلیسی ها .
2 ) حمله انگلستان به هرات ایران در زمان ناصر الدین شاه قاجار و سپس اشغال این شهر همیشه ایرانی و اتصال آن به افغانستان .
3 ) تقسیم نمودن ایران به دو قسمت شمالی و جنوبی , قسمت شمالی در دست روس و قسمت جنوبی برای چپال نفت ایران در دست انگلستان .
4 ) حمله ترکان عثمانی به خاکهای ایران و سپس اشغال شهرهای همیشه ایرانی کردستان و سپس 3 تکه نمودن آن بین عراق و سوریه و ترکیه . که البته بیش از دوره قاجار عملی شد . امروزه نیز نفت بیکران کردستان عراق که از مرغوب ترین نفتهای جهان است توسط انگلستان و آمریکا به یغما می رود .
5 ) نبردهای گسترده ایران و روسهای اشغالگر و سپس تحمیل قرارداد ننگین ترکمانچای و گلستان و اشغال شهرهای آریایی ایران منجمله : سمرقند , بخارا , بلخ , تاجیکستان , ایروان , گنجه , باکو , ارمنستان , گرجستان , داغستان و مرو و . . .
6 ) حمله اتحادیه عرب , انگلستان , آمریکا و فرانسه بر ضد ایران در نبرد نابرابر 8 ساله ایران و عراق برای تجزیه شهر مملو از نفت خوزستان ایران زمین , فروش اسلحه های پوسیده و قدیمی خود به ایران و عراق و سپس عقب نگه داشتن حداقل 20 ساله ایران که همیشه ابر قدرت منطقه خاورمیانه بوده است و درگیر نمودن ملت ما را با جنگ ویرانگر برای رها کردن پیشرفت و قدرت گرفتن دوباره .
7 ) آخرین این موارد استعماری نیرنگهای انگلستان برای جدا کردن بحرین ایران در حدود 40 سال پیش بود . انگلستان با هزاران فریب و نیرنگ و درخواست از جوامع بین المللی ایران را در تنگا قرار داد تا در نهایت جزیره مملو از ثروت بحرین از ایران جدا شود و انگلستان با خیالی آسوده به مروارید ها و نفتهای بیکران بحرین دست درازی نماید . جزیره ای که همیشه ایرانیان و بخشی از اعراب در آنجا ساکن بودند و زبان پارسی نیز آنجا رونق بسیاری داشته است . بیشتر . . .
به راستی تا به کی بایستی در انتظار کشورهای متجاوز باشیم و دست روی دست بگذاریم تا خیانتی بر ما روا شود و ما دفاع نماییم ؟ به راستی تا به کی بایستی بنشینیم و شاهد ظلم و ستم بر مردمان کرد ایرانی در ترکیه باشیم . امروز روز پاسخ دادن به این حرکات ضد ایرانی بیگانگان و جذب خاکهای ایرانی است . از دیدگاه ایرانیان به کار بردن واژه غیر واقعی و بیگانه پرور ملت آذربایجان , ملت تاجیکستان , ملت کردستان , ملت ازبکستان , ملت ارمنستان . . . فاقد مشروعیت تاریخی , فرهنگی و قانونی است . ملت ایران برای آنکه بار دیگر دست آویز چنین توطئه های اهریمینی بیگانگان نشوند , برای آنکه بار دیگر با هم میهنانشان در کنار هم زندگی کنند , برای آنکه آداب و رسوم ایرانی این منطقه را برای ابد زنده نگهدارد , برای آنکه از شهرهای کوچک و دور افتاده خود یک اتحادیه جهانی بسازد و برای آنکه بار دیگر بر منابع خود کنترل داشته باشند و یک اتحادیه یا کنفدراسیون ابر قدرتی منطقه را تشکیل دهند تنها و بهترین گزینه یکی شدن باردیگر اقوام ایرانی است . تشکیل ملت حقیقی ایران همچون گذشته برای رسیدن به جایگاه بزرگ ایرانیان در جهان و برترین کشور آسیایی از دید فرهنگ , تاریخ و تمدن , نظامی و . . . امری ضروری و مهم می باشد .
اگر سفری کوتاه به شهرهای ایرانی قفقاز و کردستان ترکیه و کردستان عراق و هرات . . . داشته باشید یا کتابهای تاریخی را مطالعه نمایید به روشنی این ادعا بر شما ثابت می شود که همگی یک ملت هستیم . گذشته از آنکه این شهرها صدها سال است زیر یوغ ترکها , عربها و روسها بوده اند ولی امروزه به زیبایی تمام فرهنگ و آداب و رسوم ایرانی خود را حفظ کرده اند که این نیازمند یک اتحادیه ایرانی است . در تمامی شهرهای کردستان سوریه , کردستان عراق , کرستان ترکیه , تاجیکستان , آذربایجان قفقاز , ارمنستان و . . . نوروز , سیزده بدر , چهارشنبه سوری , آتش افکنی های زرتشتی باستانی ایران و دیگر مراسم ملی ما به زییایی تمام برگزار می شوند و این امر را مایه افتخار آنان نیز می باشد . موسیقی سنتی و زیبای محلی این مناطق , فرهنگ , آداب و رسوم و . . . همگی به شیوه ایرانی و اقوام آریایی اجرا می شود . پس ما نیز باید از آنان حمایت کنیم تا باردیگر یک ملت ایرانی اصیل شویم . تشکیل یک اتحادیه بزرگ در منطقه حقی است که در تمامی مراجع قانونی و دادگاهها بین المللی قانونی و طبیعی می باشد . گویی اینکه این کار نه نیازی به لشگر کشی و نه نیازی به حرکات نظامی دارد . بلکه فقط با جذب فرهنگی و تاریخی این مناطق و شناساندن هویت اصلی شان امکان پذیر است . ایجاد کلوبهای مشترک , جشنهای مشترک ملی و دینی, برداشتن مرزهای غیر واقعی با ایران از راهکارهای این اتحادیه ملی است .
در پایان سخن باید یادآور شد به کار بردن واژه جعلی"ملت فارس" یا "کشور پارسیان" به جای "ملت ایران" و یا "زبان پارسی" تنها شیوه انیران ( ضد ایرانیان ) است . گویی اینکه در روزگار باستان یونانیان ما را امپراتوری پارس مینامیدند ولی ایران نامی بسیار کهن تر از پرشیا یا پارس یونانیان است . در سایه نام ایران ( سرزمین و خواستگاه آریایی ها ) در قرن بیستم است که می توانیم روان کوروش بزرگ را شاد و زنده کنیم . ولی در سایه نام پارس فقط یک قوم آریایی را میتوانیم زنده نگه داریم نه کل خاکهای آریایی و ملت ایران را . نام پرشیا تا پایان دوره ننگین قاجار در نقشه های ایران جاری بود و پس از روی کار آمدن رضا شاه بزرگ فرمان تغییر نام از پرشیا به ایران در تمامی نقشه های دنیا صورت گرفت . پارس تنها یک قوم دلاور و غیور آریایی است که همیشه صحنه ساز بزرگی و مردانگی بوده است . پارسیان مانند دیگر اقوام آریایی ( مادها , پارت ها , باکتریان و سغدیان و . . . ) همگی بخشی از ایران آریایی و بزرگ هستند . پارسی هم یک زبان فرامنطقه ای و گسترده در خاورمیانه است که حتی شاهنشاهان هخامنشی نیز از زبان پارسی باستانی استفاده میکردند . پس از حمله اعراب این زبان تغییرات بسیاری کرد و باردیگر به همت فردوسی ابر مرد تاریخ جهان زنده شد و امروز زبان ملی ماست . دکتر غلامحسین ساعدی نویسندهء بزرگ ایران که خود آذری بود و به زبان مادری خودش هم سخت علاقمند بود و در روزگاران نوجوانی ، با فرقهء دموکرات آذربایجان همکاری کرده بوده در باره زبان فارسی و اهمیتش در ایجاد همبستگی و نقش ِ آن در وحدت ملی ما ایرانیان ، طی مصاحبه ای با رادیو بی بی سی می گوید :
"زبان فارسی ستون ِ فقرات یک ملت عظیم است . من می خواهم بارش بیاورم . هرچه که از بین برود ، این زبان باید بماند "
الفبا شماره 7 ص.10 چاپ پاریس ، سال 1365
در طول قرن ها، سرزمین های ایران و هند و آسیای مرکزی و آسیایِ صغیر , از مرزِ چین گرفته تا کرانه های شرقی اروپا , گاهواره و میزبان و پناهگاهِ زبان فارسی بوده و طیّ دوران های متمادی و مُستمرّ مردم ِبیشماری ازاقوام و نژادهای گوناگون به زبان , فارسی یا دری متکلّم بوده اند و رفتار و روحیات و فرهنگشان با این زبان گره خورده و در این زبان تبلور یافته است . حتی حکیم نظامی گنجوی شاعر بزرگ ایرانی که در منطقه آذربایجان زندگی می نموده یا مولانا و . . . همگی پارسی را بر دیگر زبانها ترجیح می داده اند . حکیم نظامی گنجوی چنین سخن گفته است :
ترک صفتی بهای ما نیست ترکانه سخن سزای ما نیست
آن کو نسبِ بلند دارد او را سخنِ بلند ، باید
ذکر این سروده نظامی گنجوی بی احترامی به مردم آذری زبان مانیست . گویی اینکه زبان ترکی آذربایجانی امروزی ( غیر از زبان آذری پهلوی گذشته ) زبانی غیر ایرانی است و طی قرون معاصر توسط حکام وقت به این سرزمین آورده شده است ولی به هر روی از دیدگاه ملت ایران زبان مادری هر منطقه ای شایسته احترام و آزادی کامل است . هم وطنان عزیز آذرآبادگانی ما با نگرشی به تاریخ می بینند که بسیاری از حکام ایران در پس از اسلام از این خطه آریای بوده اند ( سلجوقیان , قاجارها , غزنویان , صفوی ها . . . ) برای ملت ایران گویشهای کردی , آذری , بلوچی و . . . همگی دارای اهمیتی بسیار است . این مقاله پژوهشی بود پیرامون پروژه ملت سازی برای اقوام ایران و شیوه خنثی کردن آن . امری که بسیار قابل توجه است و بایستنی است نه تنها مانع چنین رویاهای استعمارگرانه ای شویم بلکه باید بر ضد آن نیز اقدام نمیاییم . مهم ترین عامل در از بین بردن این فتنه انگیزی های ضد ایرانی تشکیل اتحادیه بزرگ اقوام ایرانی است که امید بسیار داریم با این رخ داد باردگیر ایران همچون زمان کوروش بزرگ متحد ترین کشور , دموکرات ترین کشور , برترین کشور آسیایی و حتی جهانی شود . این امر نیازمند یاری تک تک ما ایرانیان است .
جستارهای وابسته به این نوشتار :
تاریخ و فرهنگ کردستان بزرگ ایران
حکیم نظامی گنجوی و تجزیه طلبان
تجزیه طلبی عوامل درونی یا بیرونی ؟
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تاریخچه نام و پیدایش ایران ( ائیرانه وئیجه )
هشدار به کشورهای عربی حوزه خلیج فارس
جمهوری آذربایجان ( ایران شمالی ) بخشی از پیکره ایران
کنفدراسیون اقوام و سرزمینهای ایران به همراه نقشه های باستانی از شهرهای ایران زمین
گذری بر فلسفه نام ماههای ایران زمین
فروردین
فروردین نام نخستین ماه و فصل بها ر و روز نوزدهم هر ماه در گاه شماری اعتدالی خورشیدی است.در اوستا و پارسی باستان فرورتینام,در پهلوی فرورتین و در فارسی فروردین گفته شده که به معنای فروردهای پاکان و فروهرهای ایرانیان است.بنا به عقیده پیشینیان,ده روز پیش از اغاز هر سال فروهر در گذشتگان که با روان و وجدان از تن جدا گشته,برای سرکشی خان و مان دیرین خود فرود می آیند و ده شبانه روز روی زمین به سر میبرند. به مناسبت فرود آمدن فروهرهای نیکان,هنگام نوروز را جشن فروردین خوانده اند. فروهران در ده روز آخر سال بر زمین هستند و بامداد نوروز پیش از بر آمدن آفتاب,به دنیای دیگر می روند.
اردیبهشت
اردیبهشت نام دومین ماه سال و روز دوم هر ماه در گاهشماری اعتدالی خورشیدی است. در اوستا اشاوهیشتا و در پهلوی اشاوهیشت و در فارسی اردیبهشت گفته شده که کلمه ای است مرکب از دو جزء:
جزء اول((اشا))از جمله لغاتی است که معنی آن بسیار منبسط است,راستی و درستی,تقدس,قانون و آئین ایزدی,پاکی....و بسیار هم در اوستا به کار برده شده است.جزء دیگر این کلمه که واژه ((وهیشت))باشد. صفت عالی است به معنای بهترین,بهشت فارسی به معنی فردوس از همین کلمه است.در مجموع این کلمه به بهترین راستی و درستی است. در عالم روحانی نماینده صفت راستی و پاکی و تقدس اهورامزداست و در عالم مادی نگهبانی کلیه آتش های روی زمین به او سپرده شده است. در معنی ترکیب لغت اردیبهشت((مانند بهشت))هم آمده است.
خرداد
خرداد نام سومین ماه سال و روز ششم در گاهشمار اعتدالی خورشیدی است. در اوستا و پارسی باستان هئوروتات ,در پهلوی خردات و در فارسی خورداد یا خرداد گفته شده که کلمه ای است مرکب از دو جزء: جزء هئوروه که صفت است به معنای رسا.,همه,درست,و کامل.دوم تات که پسوند است برای اسم مونث,بنابراین هئوروتات به معنای کمال و رسایی است.ایزدان تیرو باد و فروردین از همکاران خرداد می باشند. خرداد نماینده رسایی و کمال اهورامزداست و در گیتی به نگهبانی آب گماشته شده است.
تیر
تیر نام چهارمین ماه سال و روز سیزدهم هر ماه گاهشماری اعتدالی خورشیدی است. در اوستا تیشریه,در پهلوی تیشتر و در فارسی صورت تغییر یافته آن یعنی تیر گفته شدهکه یکی از ایزدان است و به ستاره شعرای یمانی اطلاق می شود.فرشته مزبور نگهبان باران است و به کوشش او زمین پاک ,از باران بهره مند می شود و کشتزارها سیراب میگردد. تیشتر رادر زبانهای اروپایی سیریوس خوانده اند.هر گاه تیشتر از اسمان سر بزند و بدرخشد مژده ریزش باران می دهد. این کلمه را نباید با واژه عربی به معنی سهم اشتباه کرد.
امرداد
امرداد نام پنجمین ماه سال و روز هفتم هر ماه در گاهشماری اعتدالی خورشیدی است. در اوستا امرتات ,در پهلوی امرداد و در فارسی امرداد گفته شده که کلمه ای است مرکب از سه جزء:
اول((ا))ادات نفی به معنی نه,دوم((مرتا)) به معنی مردنی,نیست و نابود شدنی و سوم تات که پسوند و دال بر مونث است. بنابر این امرداد یعنی بی مرگی و آسیب ندیدنی یا جاودانی. پس واژه ((مرداد))به غلط استعمال می شود.در ادبیات مزدیسنا امرداد یکی از امشاسپندان است که نگهبانی نباتات با اوست. در مزدیسنا شخص باید به صفات مشخصه پنج امشاسپند دیگر که عبارتند از :
نیک اندیشی,صلح و سازش,راستی و درستی,فروتنی و محبت به همنوع,تامین اسایش و امنیت بشر مجهز باشد تا به کمال مطلوب همه که از خصایص امرداد است نایل گردد.
شهریور
شهریور نام ششمین ماه سال و روز چهارم هر ما در گاهشماری اعتدالی خورشیدی است. در اوستا خشتروئیریه,در پهلوی شتریور و در فارسی شهریور میدانند. کلمه ای است مرکب از دو جزء:خشتر که در اوستا و پارسی باستان و سانسکریت به معنی کشور و پادشاهی است و جزء دوم صفت است از ور به معنی برتری دادن وئیریه یعنی برگزیده و آرزو شده و جمعا یعنی کشور منتخب یا پادشاهی برگزیده . این ترکیب بارها در اوستا به معنی بهشت یا کشور آسمانی اهورامزدا آمده است. شهریور در جهان روحانی نماینده پادشاهی ایزدی و فر و اقتدار خداوندی است و در جهان مادی پاسبان فلزات .چون نگهبانی فلزات با اوستاو را دستگیر فقرا و ایزد رحم و مروت خوانده اند.روایت شده است شهریور آزرده و دلتنگ می شود از کسی که سیم و زر را بد به کار اندازد یا بگذارد که زنگ بزند.
مهر
در سانسکریت میترا ,در اوستا و پارسی میثر ,و در پهلوی میتر,و در فارسی مهر گفته می شود. که از ریشه سانسکریت آمده به معنی پیوستن. اغلب خاورشناسان معنی اصلی مهر را واسطه و میانجی ذکر کرده اند.مهر واسطه است میان آفریدگار و آفریدگان.میثره در سانسکریت به معنی دوستی و پروردگار و روشنایی و فروغ است و در اوستا فرشته روشنایی و پاسبان راستی و پیمان است.مهر,ایزد هماره بیدار و نیرومند استو برای یاری کردن راستگویان و بر انداختن دردغگویان و پیمان شکنان در تکاپوست.مهر از برای محافظت عهد وپیمان و میثاق مردم گماشته شده است.از این رو فرشته فروغ و روشنایی نیز هست که هیچ چیز ار او پوشیده نمی ماند.برای انکه از عهده نگهبانی بر آید اهورامزدا به او هزار گوش و ده هزار چشم داده است.مقام مهر در بالای کوه ((هرا))است,انجایی که نه روز است و نه شب ,نه گرم است و نه سرد,نه ناخوشی و نه کثافت .مهر از آنجا بر ممالک آریایی نگران است.این ؟آرامگاه خود به پهنای کره زمین است یعنی مهر در همه جا حاضر است و با شنیدن آوای ستمدیدگان آگاه گشته به یاری آنان می شتابد.
آیین مهر در دین مسیح نیز مشهود است.ایزد مهر در اصل بجز ایزد خورشید بوده است اما بعدها آندو را یکی دانسته اند.مورخان یونانی مهر را به نام میترس یاد کرده اند و دکر کرده اند که ایرانیان خورشید را به اسم ((میترس))میستایند.از این خبر پیداست که در یک قرن پیش از میلاد مسیح آندو با یکدیگر خلط شده اند.نگهبانی ماه هفتم و روز شانزدهم هر ماه را به عهده ایزد مهر است.
آبان
در اوستا آپ در پارسی باستان آپی و در فارسی آب گفته می شود.در اوستا بارها ((آپ))به معنی فرشته نگهبان آب استعمال شده و همه جا به صیغه جمع آمده است.نام ماه هشتم از سال خورشیدی و نام روز دهم از هر ماه را,آبان میدانند.ایزد آبان موکل بر آهن است و تدبیر امور و مصالح ماه به او تعلق دارد.به سبب آنکه((زو))که یکی از پادشاهان ایران بود در این روز با افراسیاب جنگ کرده ,او را شکست داده,تعاقب نمود و از ملک خویش بیرون کرد, ایرانیان این روز را جشن می گیرند,دیگر آنکه چون مدت هشت سال در ایران باران نبارید مردم بسیار تلف گردید و بعضی به ملک دیگر رفتند. عاقبت در همین روز باران شروع به باریدن کرد و بنابراین ایرانیان این روز را جشن کنند. آفتاب در این ماه در برج عقرب یا کژدم قرار می گیرد.
آذر
در اوستا آتر ,آثر,در پارسی باستان آتر,در پهلوی آتر,و در فارسی آذر می گویند. آذر فرشته نگهبان آتش و یکی از بزرگترین ایزدان است.آریائیان(هندوان و ایزدان)بیش از دیگر اقوام به عنصر آتش اهمیت میدادند.ایزد آذر نزد هندوان ,آگنی خولنده شده و در ((ودا)) (کتاب کهن و مقدس هندوان)از خدایان بزرگ به شمار رفته است. آفت اب در این ماه در برج قوس یا کماندار قرار می گیرد.
دی
در اوستا داثوش یا دادها به معنی آفریننده ,دادار و آفریدگار است و غالبا صفت اهورامزدا است و آن از مصدر ((دا)) به معنی دادن و افریدن است.در خود اوستا صفت دثوش(=دی)برای تعیین دهمین ماه استعمال شده است. در میان سی و روز ماه,روزهای هشتم و بیست و سوم به دی(آفریدگار,دثوش)موسوم است. برای اینکه سه روز موسوم به ((دی))با هم اشتباه نشوند نام هر یک را به نام روز بعد می پیوندند. مثلا روز هشتم را ((دی باز)) و روز پانزدهم را ((دی بمهر))و....دی نام ملکی است که تدبیر امور و مصالح روز و ماه دی به او تعلق دارد.
بهمن
در اوستا وهومنه ,در پهلوی وهومن,در فارسی وهمن یا بهمن گفته شده که کلمه ای است مرکب از دو جزء: ((وهو))به معنی خوب و نیک و ((مند))از ریشه من به معنی منش:پس یعنی بهمنش,نیک اندیش,نیک نهاد.نخستین آفریده اهورامزدا است و یکی از بزرگترین ایزدان مزدیسنا. در عالم روحانی مظهر اندیشه نیک و خرد و توانایی خداوند است. انسان را از عقل و تدبیر بهره بخشید تا او را به آفریدگار نزدیک کند.یکی از وظایف بهمن این است که به گفتار نیک را تعلیم می دهد و از هرزه گویی باز می دارد.خروس که از مرغکان مقدس به شمار می رود و در سپیده دم با بانگ خویش دیو ظلمت را رانده ,مردم را به برخاستن و عبادت و کشت و کار می خواند,ویژه بهمن است.همچنین لباس سفید هم از آن وهمن است. همه جانوران سودمند به حمایت بهمن سپرده شده اند و کشتار در بهمن روز منع شده است. بنا به نوشته ابوریحان بیرونی جانوران سودمند به حمایت بهمن سپرده شده اند و کشتار در بهمن روز منع شده است.بهمن اسم گیاهی است که به ویژه در جشن بهمنجه خورده می شود.و در طب نیز این گیاه معروف است.
اسفند
دراوستا اسپنتا آرمیتی,در پهلوی اسپندر,در فارسی سپندار مذ,سفندارمذ,اسفندارمذ,و گاه به تخفیف سپندار و اسفند گفته شده که کلمه ای است مرکب از دو جزء: سپند,که صفت است به معنی پاک و مقدس,یا ارمئتی هم مرکب از دو جزء: اول آرم که قید است به معنی درست,شاید و بجا.دوم متی از مصدر من به من معنی اندیشیدن . بنابراین ارمتی به معنی فروتنی,بردباری و سازگاری است و سپنته آرمتی به معنی بردباری و فروتنی مقدس است.در پهلوی آن را خرد و کامل ترجمه کرده اند.سپندارمذ یکی از امشاسپندان است که مونث و دختر اهورامزدا خوانده شده است.وی موظف است که همواره زمین را خرم ,آباد,پاک و بارور نگه دارد,هر که به کشت و کار بپردازد و خاکی را آباد کند خشنودی اسپندارمذ را فراهم کرده است و آسایش در روی زمین سپرده به دست اوست و خود زمین نیز نماینده این ایزد بردبار و شکیباست و مخصوصا مظهر وفا و اطاعت و صلح و سازش است .بیدمشک گل مخصوص سپندارمذ می باشد.













































